उदास दिन की मुस्कान
सूरज उग कर भी नहीं उगता है
फूल खिल कर भी नहीं महकता है
गीली ही रहती है बिना ओस के गिरे ही वो ज़मीं 
ये खराब मौसम तो नहीं फिर भी मौसम खराब रहता है  
कि क्यों छु लिया था उस सांझ के ढलते सूरज को 
अपने ख्वाबों भरे मन से
लबों पर खामोशी और आँखों में नमी 
जलते हुए दिल में धुआँ धुआँ सा रहता है
वो तकिया भी राख गिराता है
दिन गीला गीला हुआ रहता है 
कि उदास दिनों में मुस्कान है
और यह मुस्कान खनकती बहुत है !!
सीमा असीम


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