दर्द की नदी बहती है अब मुझमें 
जिस पर निशा की छाया रहती है 
न उसमें कोई हलचल न कोई तरंग 
न कोई उत्साह अब उसमें समुंदर से मिलने का 
फिर भी बहती रहती है 
न जाने किस धुन में 
पोर पोर पीड़ा से दुखता है 
मानों कोई घाव रिसता रहता है 
बस प्रेम से भरी आत्मा का प्रकाश है 
जो लौ जगाए है 
सत्य की आस्था है 
फिर भी सिसकती है 
बहुत सिसकती है 
मेरी आत्मा चीत्कार करते हुए
इस झूठ और छल की दुनियाँ में !!
सीमा असीम

Comments