इंतज़ार की आरज़ू अब नहीं रही ,
खामोशियो की आदत सी हो गयी ,
न शिकवा रहा न शिकायत
अगर है तो सिर्फ मोहब्बत,
जो इन तन्हाइयों से हो गई ....!

न जाने ये कैसे अश्क हैं जो बार आँख मे भर आते हैं॥ नमी आँख की सूखने ही नहीं देते ...पल पल में प्रिय तुम्हारी याद का आना और मजबूर कर देना कस कर आँखों को बंद कर देने के लिए ....नहीं अब और नहीं बहने देने हैं अश्क ...नहीं अब और नहीं गिरने देने हैं अश्क ...नहीं अब और नहीं ....बस इसीलिए अपनी पलकों को खोलने का मन नहीं करता ....कि कहीं टपक कर नीचे न गिर जाएँ ....एक भरोसा ॥एक विश्वास ॥ बस खुद पर ॥ जीने के लिए ...बार बार मर जाना ...समझ ही नहीं आता ये कैसा जीवन है जिसमें कोई ख़्वाहिश ही नहीं ...कोई तमन्ना ही नहीं ....एक तेज उठती हूक कि मेरे प्रेम पर कैसी गम की ॥दर्द की ॥ दुख की ॥ और अशकों की छाया आ गयी जिसने भुला दी हंसी ॥ खुशी ॥ और मुस्कान .... न जाने ये कैसी बेचैनी ॥ तड़प और मन में घबराहट है जो न सोने देती है और न ही जागने .....यूं ही निढाल से जिस्म से यादों के बबंडर में खोये रहना आदत सी हो गयी है ....ओ मेरे पवित्र और दिव्य प्रेम मेरे मन में नयी ऊर्जा का संचार कर दो .... सुबह की पहली किरण सी आस जागा दो और बिखरा दो मेरे आसपास वही अलौकिक रोशनी जो रोशन कर दे मेरे जहां को .....क्रमशः 
सीमा असीम

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