रिया मुस्करा 


ये दिन क्यों निकलता है !
ये रात क्यों होती है !!

बिस्तर पर लेटते ही आँख भर आती है समझ ही नहीं आता है क्यों ? हल्की सी कसक सीने में होती है और दिल मचल सा उठता है किसी नासमझ मासूम छोटे बच्चे की तरह फिर तकिये को खुद से कस कर चिपका कर आँखें बंद कर लेती हूँ और खो जाती हूँ उस मधुर संसार में जहां मेरे प्रियतम तुम मेरा इंतजार कर रहे होते हो ...गुजर जाती है यूं ही रात, स्वप्न हिंडोले में साथ साथ झूलते हुए ॥यूं ही मुस्कराते, बतियाते, लाड लडाते कब मंदिरों की शंख ध्वनि से आँख खुल जाती है पता ही नहीं चलता और मैं तुम्हारा मनन करने बैठ जाती हूँ ....घंटों इसी तरह एक ही मुद्रा में और एक ही तरफ टकटकी लगाए देखते हुए ...वैसे मेरे प्रिय तुम्हें याद करने का, बात करने कोई वक्त नहीं होता है लेकिन जब तेज धड़कती हुई धड़कनें  बेकाबू सी होने लगती हैं तब जी चाहता है कि मैं तुम्हें अपने आर्लिंगन में ले लूँ और चुंबनों की बौछार कर दूँ ....ज़ोर से कहूँ कि प्रिय तुम मेरा प्यार हो ...हाँ तुम ही तो हो मेरा प्रेम ....मेरे सनम सिर्फ तुम ....मेरे प्रियतम.तुमने ही तो मेरे प्रेम को परवाज़ दी  ॥अनंत ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए पल पल में सदा साथ निभाते हुए ...
क्रमशः 
सीमा असीम

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