रिया मुस्करा
मेरी बढ़ती जाती धड़कनों पर आज कैसी बेबसी है ? आज ये कैसी प्यास  मन में जाग गयी है ? ये कैसी तड़प है ? मेरी आँखों से बहने वाले इन अश्रुओं का क्या कसूर है प्रिय ? ये कैसी दुहाई मेरे लबों पर आ गयी है ? बहुत पीड़ा अहसनीय ...... ये कैसी याद है जो मेरी जान लेने को आमादा हो गयी है ? न जाने क्यों ? ओ मेरे सनम.... ओ मेरे प्रिय ....ओ मेरे प्रियतम ....मैं तुम्हें कोई तकलीफ नहीं देना चाहती ...कोई भी दर्द तुम्हारे हिस्से नहीं करना चाहती ...
मैं इस दर्द को, इस तकलीफ को अकेले ही सहना चाहती हूँ लेकिन यह दर्द आज मेरी जान क्यूँ लेना चाहता है ? क्यों इतना कमजोर और बेबस कर रहा है ? मैं रात के इस पहर में घर का दरवाजा खोलकर सड़क पर अकेले निकल जाने को बेचैन सी क्यों हो रही हूँ ? मैं घर की छत पर जाकर तारों को गिनते हुए रात गुजार देने को बेचैन सी क्यों हो रही हूँ या नीम के उस पेड़ से बातें करना चाहती हूँ जो हमारे प्रेम के चढान दिनों में साक्षी था


हमारी प्रेम भरी बातों का ...या उन वादियों में या उन घाटियों में उड कर पहुँच जाना चाहती  हूँ ... जहां पर प्रिय तुमने अपना प्यार मेरे रोम रोम पर अंकित कर दिया था ...
ओ मेरे प्रिय ....ओ मेरे प्रियतम ,,,,ओ मेरे सनम ॥ओ मेरा दिव्य प्रेम .....
क्रमशः 
सीमा असीम 

Comments

Popular posts from this blog

मुस्कुराना

याद