मुक्तक
वे आते हैं यूं जैसे  कोई बयार मझे चूमकर चली जाती है 
वे आते हैं यूं जैसे छोटी सी बदली बरसने को मचल जातीहै 
नीम की पत्ती सरसराती हुई जैसे दुबक जाती है आगोश में
वे आते हैं यूं जैसे मिट्टी भी सुगंधित होकर महक जाती है !!
सीमा असीम

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