गतांक से आगे 


कैसे कहूँ साजन कि ये विरहा के दिन कैसे कटते हैं ...हम पल में हंसते और पल में रो पड़ते हैं....रातों को अपने तकिये को कितना भिगोते हैं ...किसी को पुकारते वक्त तुम्हारा नाम ले लेते हैं और झट से बात बदल कर यूं मुसकराते हैं कि वे कुछ समझ न पाएँ ...कभी कोई सहेली जब पूछ लेती है कि तू अक्सर क्यों बीमार रहती है तो मौसम का बहाना बनाकर रोग को छुपा लेती हूँ .......हर पल में तड़पना ॥मचलना ,, सिसकना और रब से फरियाद करना आखिर ये विरहा के दिन हम कैसे बिताएं ? तुम ही बताओ हमें ये दुखों के हसीन पल हम तुम्हें किस तरह बतायेँ ? ये जुदाई ये तनहाई और रुसबाई प्रेम का ही तो उपहार है न ...आपका दिया हुआ... इसे आत्मा से निभाती रहती हूँ .. .मेरे प्रिय सनम एक बात बताओ ...क्या तुम भी मुझे यूं ही याद करते हो ? क्या तुम भी यूं ही नाम लेकर आवाज देते हो ? क्या तुम भी यूं ही ख्वाबों ख़यालों  में गुम रहते हो ? जब तुम मुझसे दूर होते हो तो क्या करते हो प्रिय ? किससे बात करते हो ? क्या खाते हो ? कैसे बैठते हो ? कहाँ कहाँ भटकते हो ? क्या कन कण में तुम भी मेरी छवि पाते हो ? मेरे प्रिय एक बार तो बताओ क्या तुम भी सच्चा प्यार करते हो ? क्या कभी तुम भी मेरे नाम की कोई दुआ मांग लेते हो ? सनम तुम एक बार मुझे सच सच बताना ...मेरे प्रिय मुझसे तुम आकर खवाबों में बता जाना ...प्रिय मेरे प्यार का मान रख लेना ......क्रमशः 

सीमा असीम

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