गतांक से आगे 
यूँ पलकों में आँसु और दिल में दर्द सोया है,
हँसने वाले को क्या पता, वो चैन से सोया है

 सुनो प्रिय ,,,मैं नहीं जानती कि यह अश्क कहाँ से चले आते हैं ...बहते हैं ...और बहते ही रहते हैं ....बिना थमें ,,बिना रुके ...न जाने कहाँ से चली आती है ये मुस्कान और ज़ोर से ठट्ठा मार कर हंस देती हूँ बिना किसी बजह ,,बिना किसी बात ,,कहीं भी ,,,कभी भी ॥कभी नींद यूं उड़ जाती है कि लाख कोशिश के भी नहीं आती और कभी यूं भी होता है कि कितनी भी जागने की कोशिश करो उठा ही नहीं जाता ...प्रिय ये कैसा प्रेम है क्या ये सच का प्रेम है ,,नहीं जानती ,,मैं सच में नहीं जानती ॥ बस इतना पता है कि यह प्रेम मेरी जान लेता है ....
आसमा से उतर आती है धवल चाँदनी सी रोशनी अमावस्या की रात में भी और शीतल कर देती है मन को ....कहीं कोई अंधेरा नहीं ,,, कहीं कोई गम नहीं ....बस बुझाती हूँ चराग और जला लेती हूँ ,,,,,,इस तरह अपने मन को बहला लेती हूँ ....मिलते कहाँ हैं इस जहां में कहीं कोई सच्चा हमदम ....मिल भी जाये तो वो कहाँ समझते है ...
प्रिय तुम अपनी धड़कनों पर अपना हाथ रखकर देख लेना ...और महसूस कर लेना .....क्योंकि मेरी धड़कनें तुम्हारी और तुम्हारी धड़कनें मेरी बन गयी हैं ... रोशनी से भरे दिल में बस एक लगन सी लगी है जैसे कोई लौ सी जल गयी है जो हरवक्त इबादत करती है ...प्रिय तुम्हें बहुत याद करती है ......क्रमशः 
सीमा असीम

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