गतांक से आगे 
रिया मुस्करा 
आज सुबह से मन में बड़ा सकूँ सा था जैसे कोई खोई खुशी सी मिल गयी हो...आँख खुलते ही मन मुस्करा दिया था...बहुत खुश इतना कि  जीभर के खाया और सोई ...लेकिन यह अचानक से क्या हुआ कि आँख से आँसू टपक पड़ा ...न जाने क्यों हुआ, पर हुआ ...मेरे प्रिय मैं तुम्हें सिर्फ प्रेम ही नहीं करती हूँ बल्कि मैं तुम्हारी नस नस में प्रवाहित होती हूँ कभी महसूस कर लेना ,,,स्वयं तुम्हें आभास हो जाएगा .क्योंकि ...ये जो हमारे प्रेम की डोरी है न बड़ी आस्था से बांधी गयी है ,,,और हमारे पवित्र हृदय के उपवन मे इसके बड़े खूबसूरत फूल खिले रहते हैं ! अगर  कोई उन फूलों को तोड़ने की कोशिश करता है या तोड़ कर फेंक देता है तो मैं बड़े धैर्य के साथ अपने अशकों से सींचकर नए फूलों को उगा लेती हूँ लेकिन अपनी आस्था को कभी टूटने ही नहीं देती ! 
मैं यह भी नहीं चाहती कि तुम सिर्फ मुझे ही प्रेम करो पर मैं यह चाहती हूँ कि मेरी आस्था को न टूटने देना ,,,मेरे प्रेम का अपमान न होने देना ,,मज़ाक न बनने देना ...
मेरे प्रिय यह मेरे सच्चे दिल कि पुकार है ....बस यह आस्था ही मेरा जीवन का धेयय बन गयी ॥
मुझे इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई क्या कहता है ? क्या करता है ? बस इतना पता है कि मैं सच हूँ मेरे मन में पवित्र आस्था है ....तुम्हारे लिए .
मेरी हर धड़कन तुम्हारे लिए है 
मेरी हर स्वांस  तुम्हारे लिए है 
जी रही हूँ तो बस तुम्हारे लिए 
मर जाऊँगी गर तो तुम्हारे लिए !!
..क्रमशः 
सीमा असीम

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