गतांक से आगे
रिया मुस्करा
सुनो प्रिय
            ये जो अचानक से आँख से अश्क बहने लगते हैं न, कितना भी रोकूँ ..रुकते ही नहीं ॥ तुम तो खुश होगे उस जहां में .....जहां से मैं आगे निकल आई हूँ ...कभी तुम्हारी आवाज कानों में आती है तो ठिठक कर पीछे मुड़कर देखती हूँ ॥ सोचती हूँ कि अरे तुमने तो यही चाहा था न कि उस जहां में खुशियाँ भर दोगे, गर मैं वहाँ न रहूँ, कितने समय से चली आ रही तुम्हारी ये कवायद, आखिर मैं समझ गयी और छोड़ आई सब कुछ तुम्हारे लिए ....स्वर्ग में रहने वाले ,,,,जन्नत के स्वामी... यूं वो देव भी कभी ये सब देखकर मेरे साथ अश्क बहाने लगते हों शायद ...तभी तो इतनी नमी हो जाती है अक्सर मौसम में .....
मेरे प्रिय ...मेरे स्वामी, मैं तो कहीं भी चली जाऊँ,, कितना भी आगे निकल जाऊँ फिर भी हर पल में, हर क्षण में, तुम्हारे साथ छाया बनकर हूँ ....जब कभी भी तुम्हें मेरी कमी सताये या जरूरत महसूस हो तुम बस एक आवाज भर लगा देना ...मैं सब भूल पलट कर आऊँगी क्योंकि मेरे प्रिय मैंने तो प्रेम किया है न ...सिर्फ तुमसे ॥तुम्हारे लिए तो जान भी हाजिर है .....और सच्चा प्रेम न कभी मरता है और न कभी नफरत करता है,, न ही कभी मुरझाता है,, सदाबहार सा होता है सच्चे मन से किया गया प्रेम ....तभी तो मैंने तुम्हें हर हाल में चाहा है जब तुमने मुझे इग्नोर किया ...जब तुमने मुझसे मेरे प्रेम छीनना चाहा ॥लेकिन प्रिय ये प्रेम झूठा नहीं था ....कितना आजमाओगे अभी ...और कितनी सजाएँ ...ये जो दोनों आँखों से बहते हुए मेरे अश्क हैं न ....बस आपकी खातिर ...बस आपके लिए ही !!
क्रमशः 
सीमा असीम

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