रिया मुस्करा


कभी कभी मन को समझाना बहुत मुश्किल होता है खासतौर से तब जब हम अकेले होते हैं.... तन्हा होते हैं और कोई भी हमारा साथ देने वाला नहीं होता है ....हम सिर्फ रोते हैं सिर्फ रोना आता है ! हमे इतना कमजोर मत करो मेरे प्रिय राज ...लेकिन हम सच हैं बस इतनी सी तसल्ली होती है हमारे मन को क्योंकि हम जिस पर विश्वास करते हैं वही हमारे विश्वास को तोड़ देता है इंसान का कोई भी विश्वास कैसे करे ...हे ईश्वर तुम ही कहो कैसे मन को समझाएँ ...जिस पर अपनी जान वार दी ,,,अब वही मेरी जान लेने पर आमादा है ॥वो मेरी जान ले उससे पहले ही ईश्वर तू मुझे अपने पास बुला ले ,,क्योंकि अब मेरा जीना बहुत कठिन हो रहा है... मैं नहीं जी पा रही हूँ ...क्यों दे रहे हो मुझे इतना दर्द ?मेरे प्रिय तुम मुझे ही क्यों सताने पर लगे हो क्या तुम्हारा कोई ईमान धर्म नहीं है मुझे इतना मजबूर मत करो प्रिय ...मत करो इतना मजबूर ...क्रमशः

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