गतांक से आगे 
सोते सोते चौंक कर आँख खुल जाती है देखती हूँ पूरा तकिया अशकों से भीगा हुआ है बिस्तर से उठ कर बाहर निकल आती हूँ मन करता है ज़ोर से चीखूँ कि आखिर तुम्हें क्या मिलता है मुझे यूं रुला कर " मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था ? किस बात के लिए तुमने मुझे यूं तन्हा और अकेला कर दिया ? मैं तो तुम्हें सच्चा प्यार करती थी न फिर तुमने मुझे इतना दर्द क्यों दे दिया ? किस कारण मेरे प्रिय किस बजह से मुझे रोने को अकेला छोड़ दिया ? काश तुमने भी मुझे मेरी तरह से ही प्यार किया होता ? काश तुमने भी मेरा पल पल में साथ निभाया होता ? काश कि तुम मेरा दर्द समझते ? काश कि तुम भी मुझे याद करते ? काश कि तुमने भी मुझे वही इज्ज़त दी होती ? काश कि तुमने भी मेरा प्रेम समझा होता ? काश ! काश ! काश ! 
अब तो सिर्फ यही काश ही बचा रह गया है ???? मैं अपनी हाथ की हथेलियाँ खोल कर देखती हूँ इनमें तो तुमने अपना नाम लिख दिया था ...फिर ये तुमने मुझे यूं अकेला रोने को क्यो छोड़ दिया ? काश तुम प्रेम को प्रेम ही समझते खेल नहीं ....ये मेरी जान ले रहा है ...मैं एक दिन मर जाऊँगी और तुम्हें कोई खबर भी नहीं होगी क्योंकि तुम्हें मेरी ज़रा भी परवाह नहीं है ...जरा भी ख्याल नहीं है ....मुझे याद आते हैं वो दिन जब तुम मुझे बिना शुभरात्री कहे नहीं सोते थे ...सुबह को दिन शुभप्रभात से ही निकलता था .....तुम मुझे पल पल में खोते जा रहे हो ,,तुम शायद जिंदगी भर यही करते आए हो क्या ? किसी को हसाना ...किसी को रुलाना ,,मेरे साथ मत खेलो यह खेल ...मैं मर जाऊँगी लेकिन तुम्हें कभी कुछ नहीं कह पाऊँगी ...बहुत ज्यादा प्यार दिया तुम्हें और तुमने मुझे यूं अकेला ...तन्हा कर दिया रोने के लिए मर जाने के लिए ...मुझे अभी तक याद है जब तुम मुझसे हर वक्त बात करने को उतावले रहते थे ...बार बार खुद मेसेज करते थे कितनी तरह से मुझे तुम प्यार दिखाते थे लेकिन अब तुम वो सब भूल गए ...मैंने तो हर समय तुम्हारा साथ दिया लेकिन तुमने ऐसा क्यों किया ? आखिर क्यों ??? क्या यही प्रेम होता है ? एक को पकड़ो ...एक को छोड़ो ....मैं नहीं समझ पा रही मैं क्या करूँ ? तुम ही बताओ कितना सब्र करूँ ....कितने दिन बीत जाते हैं यूं ही मेरे .....कहाँ गुहार लगाऊँ ? किस्से कहूँ ? मेरा न्याय कौन करेगा मेरा दर्द कौन बांटेगा जबकि यह दर्द ॥ये जख्म मुझे तुम दे रहे हो ...मेरे वे दिन अच्छे थे जब मैं किसी को प्रेम नहीं करती थी चैन से सो जाती थी ...वो दिन भी अच्छे थे जब तुम प्रेम करने लगे और मैं भी प्रेम करने लगी  फिर तुम भटक गए और मुझे रुलाने लगे... सताने लगे तड़पाने लगे //क्या तुम्हारा एक बार भी दिल नहीं कसकता? क्या तुम्हें कुछ भी नहीं होता ? मुझे लगता है जब हम किसी को प्यार करते हैं तब उसे हमारे दिल की एक एक बात पता होती है वो हमाऋ खुशी में खुश और दुख में दुखी होता है लेकिन तुम्हें शायद कुछ नहीं होता ..अब तो इंतजार है सिर्फ इंतजार ....क्रमशः 
सीमा असीम

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