गतांक से आगे
आजकल याद कुछ और रहता नहीं
एक बस आपकी याद आने के बाद
मेरे प्रिय मैं लिख रही हूँ शरद पुर्णिमा की रात में प्रेम ...मैंने सुना है कि आज की रात अमृत बरसता है इसलिए मैंने तारों की छाँव में चाँद के नीचे बिछा दिया अपना प्रेम ...अगर सच होगा, दिखाबे से दूर होगा तो बरस जाएगा अमृत और चूम कर हमारे प्रेम को कर देगा अमर सदियों तक के लिए ....मेरे प्यारे सनम अमृत तो तब भी बरस जाता है जब तुम अपनी प्यारी मुस्कराहट ओढ़कर मेरे सपनों में आ जाते हो और मैं शांत मन से लेटी रहती हूँ जागते हुए भी खो जाती हूँ ख्वाबों में ताकि तुम्हारा वो मोहक रूप मेरे सर्वांग को पवित्र कर दे ...
क्या पता वो शरद पुर्णिमा का चाँद भी यूं ही हमारी प्रतीक्षा करता हो ...यूं ही दुआएँ मांगता हो ...यूं ही खोया रहता हो .॥यूं ही मासूम मुस्कराहट को सजोता रहता हो .यूं ही प्रेम भरी आँखों में झाँकने को पी लेता हो विष भी ....क्योंकि यूं ही तो नहीं आ जाता सच्चा प्रेम दामन में ....वो शरद पुर्णिमा का चाँद भी तो धन्य धन्य हो जाता होगा हमारे ऊपर ॥हमारे प्रेम के ऊपर अपना अमृत बरसा कर ॥
चलो प्रिय आज गुनगुनाते हैं वो प्रेम गीत जो तुमने लिखे थे डूबकर मेरे प्रेम में ...आओ प्रिय इस शरद की रात को हम अमर कर दें अपने प्रेम से ...,,वो आज अमृत बरसाए और हम हमेशा प्रेम बरसाते रहें यूं ही निष्कपट और निश्छल मन से ...
आजकल याद कुछ और रहता नहीं
एक बस प्यार से दिल लगाने के बाद
क्रमशः
सीमा असीम

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