गतांक से आगे 
रिया मुस्करा
सुनो प्रिय 
            मेरे  प्रिय तुम खुश हो न ...मैं तो तुम्हें हर बार, हर दफा खुशी ही तो देना चाहती थी और  तुम  मुझे दुख ... हैं न ...लेकिन फिर भी कोई बात नहीं आप खुश तो हैं  यही बहुत है ..मैं जो देना चाहती थी,,, वही सब दिया और जो तुम देना चाहते थे वो तुमने दिया तो इसमें गलत कुछ भी नहीं.. सब सही है ...मुझे पता है ...तुमने मुझे हमेशा गलत समझा मुझसे प्रूफ मांगे ॥लेकिन प्रिय मेरे साथ मेरी प्रकृति है और हमेशा ही रहेगी ,,,,तुम कभी भी देख लेना ॥कभी भी आजमा लेना ...सब कुछ एक दिन सामने ही आता है और आता भी रहा है ...प्रिय मेरा रब जानता है कि मुझे कभी कहीं भी आजतक किसी के भी सामने अपना सर झुकने की नौबत ही नहीं आई और शायद कभी भी नहीं आएगी लेकिन मैंने तुम्हारे सामने अपना सर झुकाया ... तुम्हें अपना रब बनाया ...हर बात मानी खुद  को खत्म करके तुम्हें  जीवित रखा है लेकिन प्रिय तुमने मुझे कभी इस लायक समझा ही नहीं... चलो कोई बात नहीं ...प्यार में कोई बदला थोड़े ही न होता है ...तुमने तो वही किया जो तुम्हारी प्रकृति थी और मैंने वो किया जो सच्चे प्यार में किया जाता है ! /प्रिय मैं तो तुम्हारी बेहद शुक्रगुजार हूँ कि तुमने मुझे ज़िंदगी का वो सबक दिया जो कोई भी नहीं दे सकता ...पता है क्या ? कि किस तरह मर मर के जिया जाता है ...पल पल में मरना ....तुम्हें शायद पता हो मरना भी कई तरह से होता है .....सही है सब सही है ....क्या हुआ कि मैं जिंदगी से उदास हूँ, निराश हूँ, दुखी हूँ या रो रही हूँ या भरोसा उठ गया है सबसे ..क्या फर्क पड़ता है ? कोई फर्क नहीं पड़ता है.. दुनियाँ ऐसे ही चलती रहेगी जैसे चलती आई है ...
.प्रेम का मतलब वो कैसे समझेंगे भला जो प्रेम को खेल समझते है ....प्रेम तो दिल रूपी सीपी का मोती है जो दो सीपियों में पलता है और फिर हीरे सा चमकने लगता है ....प्रेम में दिल हीरा हो जाता है... जितने अश्क बहते है उतना ही और निखरता चला जाता है चमक बढ़ती चली जाती है ...क्रमशः 
सीमा असीम

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