मैंने अपने दोनों हाथों में अंजुरी में भरकर फूलों को हवा में उछाल दिया और लिखने लगी प्रिय तुम्हें इस ब्रह्म मुहूर्त में ....सुनो मेरे प्रिय इस समय मंदिरों में शंख व घंटों की पवित्र ध्वनि बज रही है और मस्जिदों में पाक अज़ानों की आवाजें मेरे पास आ रही हैं फिर भी बिना विचलित हुए मैं मन से मन का नाता जोड़कर मैं कर रही हूँ तुमसे बात॥प्रिय अगर ऐसा होता है तो क्यों होता है ? अगर वैसा होता है तो क्यों होता है ? जो तकलीफ हमें कष्ट देती है हम वही दर्द तकलीफ घुटन दूसरे को क्यों दे देते हैं ?कया तब उसकी आत्मा उसे नहीं कचोटती ? दूसरों पर इल्ज़ाम लगाते वक्त क्यों भूल जाते हैं कि इसमें तो हम भी साझीदार थे और  जब कोई अपनी आवाज तेज करके दूसरे की आवज को दबाना या बंद करना चाहता है तब हम ये क्यों नहीं याद रखते  हैं कि कभी कोई अन्य हमसे भारी भी मिल सकता है सेर को सवा सेर या फिर ऊँट कभी तो पहाड़ के नीचे आएगा ऐसा कुछ .....जब हम ज़ोर से चीखते चिल्लाते और शोर मचाते हैं तो क्या हम सच हो जाते है ? या दूसरों को नीचा दिखाकर हम ऊंचे उठ जाते हैं ?वो यह क्यों नहीं सोचते कि एक उंगली किसी दूसरे की तरफ उठाते हैं तो बाकी की तीन उँगलियाँ हमारी तरफ ही तो उठती हैं ....ऐसे ही न जाने कितने ही सवाल जवाब मन को मथ डालते हैं कभी कभी .....! 
मैं तो खुशबू हूँ ज़र्रे ज़र्रे में बिखर जाऊँगी 
न समेटो न बटोरो भला हाथ कैसे आऊँगी !!
मेरे प्रियतम मैं वोसब करूंगी जोतुम चाहोगे 
कहो या न कहो मैं खुद ही समझ जाऊँगी !!
इन दिनों मैं तप रही हूँ न  जाने ये कैसा ताप है जो मेरा पीछा ही नहीं छोड़ रहा ....दर्द से नस नस कसक रही है ...कभी लगता है ....या तो यह दुनियाँ मेरे लिए नहीं बनी या मैं इस दुनियाँ में रहकर भी इस दुनियाँ की नहीं हूँ ....शायद मैं अलग हूँ ....सबसे अलग .....मैं सिर्फ अपने प्रियतम की हूँ सिर्फ अपने प्रिय की ....दूर रहकर भी पल भर दूर या अलग नहीं हूँ .....मेरा वजूद ,,मेरा वक्त ,,,मेरी स्वांसे ...और मेरी वफा सिर्फ तुम्हारे लिए मरने के बाद भी ....आजमाने की कोशिश नहीं करना बस इसे महसूस कर लेना मेरे प्रिय ...ओ मेरे सर्वस्व ......
क्रमशः 
सीमा असीम

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