गतांक से आगे
रिया मुस्करा
दिल में किसी के प्यार का जलता हुआ दिया
दुनियाँ की आंधियों से भला ये बुझेगा क्या
सुनो प्रिय मैंने तुमसे प्यार किया अपने सच्चे दिल से ...मन की अनंत गहराइयों में उतर कर चाहा.. तो मेरे प्रिय उसका तुमने मुझे ये सिला दिया है ? क्या तुम जानते हो मेरे आँसू पल भर को भी नहीं थमते ...मैं समझ नहीं पाती कि आखिर बेइंतहा प्यार करना क्या इस दुनियाँ में सबसे बड़ा गुनाह है ? मैं कितने समय से देख रही हूँ, पढ़ रही हूँ, महसूस कर रही हूँ ....क्या तुम खिलाड़ी हो ? क्या तुम्हारे लिए प्रेम कोई खेल है समझ ही नहीं आता कि कोई ऐसा क्यों करता है ? क्या किसी की वफा का सिला बेवफाई से देना चाहिए ....समझ नहीं आता आखिर तुम चाहते क्या थे ? मैं तो यही सोचकर बेचैन होती हूँ ॥घबराहट से भर जाती हूँ ,, इतना ज्यादा व्यथित हो जाती हूँ एकदम से बीमार कि बिस्तर से उठा ही नहीं जाता ...न खाना, न पीना, न सोना ,...कुछ जीवन ही शेष नहीं बचाता जैसे जिस्म में ....कि कैसे तुमने किसी और को अपने गले से लगाया होगा ? कैसे तुमने उसका मस्तक चूमा होगा ? क्या यह व्यभिचार नहीं है कि एक रिश्ते को जीते हुए दूसरे में भी जीने लगना ....कैसे किया होगा प्रिय तुमने कैसे किया होगा ? एक बार जी में आता है कि इस शरीर को नष्ट कर दूँ ....सच में अपने जिस्म से निकल जाना चाहती हूँ ,,मेरी आत्मा चीखने लगती है ...प्रिय तुम एक बात तो बताओ मैं तुम्हें निभा रही हूँ तुम्हें जी रही हु और तुम किसी और को जियो या सोचो तो वह गलत नहीं है ...जब दुनियाँ में भरोसा ही नहीं तो ऐसी दुनियाँ में रहने का क्या फायदा ?
मैंने तो जीते जी ही सबसे अपना मुंह मोड लिया ... कोई भी नजर ही नहीं आता एक तुम्हारे सिवाय और तुम हो कि ख्याल ही नहीं ,कि किसी का दिल दुखता है , किसी को दर्द होता है , कोई हर वक्त रोता है ,,,ओ मेरे ईश्वर मुझे इस पीड़ा से निजात दिलाओ ,मुझे अहसास दो , मुझे ऊर्जा दो ताकि मेरे जिस्म में जान आ सके ... ताकि मैं उठकर खड़ी हो सकूँ ... मुझे पता है मैं प्रेम में हूँ ,, सच्चे प्रेम में, तो मुझे भी सच्चा प्रेम दिला दो ,मेरा भरोसा लौटा दो, मुझे जीवन दे दो ...मुझे जीवन दे दो ....क्रमशः
सीमा असीम
रिया मुस्करा
दिल में किसी के प्यार का जलता हुआ दिया
दुनियाँ की आंधियों से भला ये बुझेगा क्या
सुनो प्रिय मैंने तुमसे प्यार किया अपने सच्चे दिल से ...मन की अनंत गहराइयों में उतर कर चाहा.. तो मेरे प्रिय उसका तुमने मुझे ये सिला दिया है ? क्या तुम जानते हो मेरे आँसू पल भर को भी नहीं थमते ...मैं समझ नहीं पाती कि आखिर बेइंतहा प्यार करना क्या इस दुनियाँ में सबसे बड़ा गुनाह है ? मैं कितने समय से देख रही हूँ, पढ़ रही हूँ, महसूस कर रही हूँ ....क्या तुम खिलाड़ी हो ? क्या तुम्हारे लिए प्रेम कोई खेल है समझ ही नहीं आता कि कोई ऐसा क्यों करता है ? क्या किसी की वफा का सिला बेवफाई से देना चाहिए ....समझ नहीं आता आखिर तुम चाहते क्या थे ? मैं तो यही सोचकर बेचैन होती हूँ ॥घबराहट से भर जाती हूँ ,, इतना ज्यादा व्यथित हो जाती हूँ एकदम से बीमार कि बिस्तर से उठा ही नहीं जाता ...न खाना, न पीना, न सोना ,...कुछ जीवन ही शेष नहीं बचाता जैसे जिस्म में ....कि कैसे तुमने किसी और को अपने गले से लगाया होगा ? कैसे तुमने उसका मस्तक चूमा होगा ? क्या यह व्यभिचार नहीं है कि एक रिश्ते को जीते हुए दूसरे में भी जीने लगना ....कैसे किया होगा प्रिय तुमने कैसे किया होगा ? एक बार जी में आता है कि इस शरीर को नष्ट कर दूँ ....सच में अपने जिस्म से निकल जाना चाहती हूँ ,,मेरी आत्मा चीखने लगती है ...प्रिय तुम एक बात तो बताओ मैं तुम्हें निभा रही हूँ तुम्हें जी रही हु और तुम किसी और को जियो या सोचो तो वह गलत नहीं है ...जब दुनियाँ में भरोसा ही नहीं तो ऐसी दुनियाँ में रहने का क्या फायदा ?
मैंने तो जीते जी ही सबसे अपना मुंह मोड लिया ... कोई भी नजर ही नहीं आता एक तुम्हारे सिवाय और तुम हो कि ख्याल ही नहीं ,कि किसी का दिल दुखता है , किसी को दर्द होता है , कोई हर वक्त रोता है ,,,ओ मेरे ईश्वर मुझे इस पीड़ा से निजात दिलाओ ,मुझे अहसास दो , मुझे ऊर्जा दो ताकि मेरे जिस्म में जान आ सके ... ताकि मैं उठकर खड़ी हो सकूँ ... मुझे पता है मैं प्रेम में हूँ ,, सच्चे प्रेम में, तो मुझे भी सच्चा प्रेम दिला दो ,मेरा भरोसा लौटा दो, मुझे जीवन दे दो ...मुझे जीवन दे दो ....क्रमशः
सीमा असीम
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