गतांक से आगे

न जाने कौन सी खुशी का आगाज होने वाला है कि आज मन गुनगुना उठा है लब पर मुस्कान है और अंग अंग थिरक रहा है .....और पुकार रहा है आनंद से विभोर होते हुए अपने प्रिय को ...ओ मेरे प्रिय ॥ओ मेरे प्रियतम ,, ओ मेरे सनम  ...क्या तुम तक मेरी आवाज पहुंच गयी है ? क्या तुम मुझे सुन पा रहे हो ? मेरी आकाश की ओर उठी बाहें समा लेना चाहती हैं अपने प्रिय को अपनी बाहों में और लगा लेने को आतुर हो रही हैं अपने धड़कते हुए सीने से कि आज मदहोश हुआ जाये रे मेरा मन ...मेरा मन ...मेरा मन.... मेरा मन ! बिना बात ही मुस्कराये रे मेरा मन ...मेरा मन ॥मेरा मन ॥ मेरा मन !!
ओ री कली तू मुस्करा ॥ मैं पाँव में पायल बांध कर थिरक रही हूँ ...कि एक जोगन अपने प्रिय से मिलने को व्याकुल हो रही है ॥मदहोश हो रही है ॥ सारे बन्धन तोड़कर वो बंध गयी है अपने प्राणों से प्यारे प्रिय के बन्धन में ॥ वो उस क्षितिज के पार जाने को मचल रही है ....मेरे प्रिय क्या तुम्हें अहसास हो रहा है ? क्या तुम्हारे मन तक ये भाव पहुँच रहे हैं ? क्या तुम भी व्याकुल हंसी मुस्करा रहे हो ? क्या तुम भी मिलन के प्रेम गीत गा रहे हो ??
आज का दिन यूं ही मुस्कराते हुए बहल जाएगा ....आज नहीं तो कल मेरे प्रिय का संदेश जरूर आएगा !!  क्रमशः 
सीमा असीम
 

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