उसने सीता बनना स्वीकार किया

न जाने क्यों ऐसा होता आया है जमाने से और आज भी हो रहा है कि सच खामोश हो जाता है और झूठ चीखता चिल्लता रहता है....खुद को सही और दूसरे को गलत साबित करने के लिए न जाने कितने रूप धरता है ..... न जाने कितने छल प्रपंच से झूठ को भी सच बनाने पर लगा रहता है ..... सच के हाथों से सबकुछ  छीन कर  झूठ  के हाथ में दे दिया जाता है और फिर उसका साथ पूरा जमाना भी देने लगता है क्योंकि जिसकी लाठी उसकी भैंस कि तरह उसकी आवाज गूंज रही होती है .....दूसरों के अवगुणों को उजागर करते समय वो यह भूल जाता कि वो  तो स्वयं  के अवगुण ही दुनियाँ के सामने परोस रहा है ....दूसरों को नीचा गिरने के चक्कर में खुद ही गिर रहा है ....दूसरों का मज़ाक बनाना ...दूसरों का अपमान करना बस यही झूठ का सबसे पहला तरीका होता है उफ़्फ़ कितना अहम ...कितना अहंकार ॥पता नहीं क्यों ।? पता नहीं किसलिए ? हम ही हर हाल में सही हैं बस यही एक भावना होती है झूठ की .....
सीता की अग्नि परीक्षा तो सदियों से होती आई है और आज भी जारी है ....न जाने क्यों सीता को ही अग्नि परीक्षा में झोंक दिया जाता है ? न जाने क्यों उसे ही तपना पड़ता है ? न जाने क्यों उसे ही बनवास सहन करना पड़ता है ? न जाने क्यों उसे ही अकेले आँसू बहाने पड़ते हैं ? न जाने क्यों उसे अकेलापन सहन करना पड़ता है ? जबकि वो स्वयम में इतनी बड़ी शक्ति है ....वो तो कुछ भी कर सकती है लेकिन उसे चुप होना पड़ता है ...सब अकेले ही सहन करना होता है ,,क्योंकि वो अपनों के लिए जीती है ...क्योंकि वो अपनों की खुशी के लिए जीती है ....अपने कलेजे से दर्द को लगाकर तन्हा जीती है ....उसके दर्द को पीड़ा को कोई नहीं समझ सकता ...उसकी तकलीफ कोई नहीं आंक सकता क्योंकि उसके लिए तो मायने रखती है अपनों की खुशी ....जो उसके दर्द को, आंसुओं को, तकलीफ को अनदेखा कर देते हैं .....सदियों से ऐसा ही होता रहा है और होता रहेगा ...सीता को अपनी पवित्रता अपनी सच्चाई के लिए अग्नि परीक्षा देती रहनी पड़ेगी .....हर जमाने में कोई एक सीता जरूर होगी जो यह परीक्षा आँख बंद करके दे रही होगी ...........
सीमा असीम

Comments

Popular posts from this blog

मुस्कुराना

याद