रिया मुस्करा
न जाने ये कैसी अवस्था है न जाने ये कैसी अनुभूति है समझ ही नहीं आती ....बेसुध सी ...खोई हुई सी ...हर पल में हर छन में ॥सोते या जागते में ....मैं तुम्हें ही तो सुमर रही थी ...कैसे खबर हुई तुम्हें प्रिय सच बताना ...बेचैनी सी थी मन में आज ...तुमसे बात कर लेने की ...और मैं कर भी रही थी ॥मैं देख रही थी प्रिय तुम्हें ही उस आइने के सामने खड़े होकर जिसके आर पार देखा जा सकता है ...बहुत ही आसानी से ...कि तुमने आकर मोहभंग कर दिया और सामने आकर खड़े हो गए ..खुशी से मेरी आंखे छलक पडी, आवाज रुँध सी गयी, मैं कुछ कहना चाहकर भी कहाँ कह पाती हूँ तब ...
सुनो मेरे प्रीतम मैं आज एक नाम दे रही हूँ तुम्हें भृंग ,,,और मैं फुनग ....पता है क्यों क्योंकि तुमने मुझे अपने जैसा ही बना लिया है,, अपने ही रंग में रंग लिया है..... रंग भी ऐसा कि तमाम उम्र रगड़ रगड़ कर, धोओ तब भी न छूटे ....उसी रंग में लिपटी मैं कभी हँसती हूँ ...कभी रोती हूँ...कभी उदास हो जाती हूँ ...मेरे प्रिय ये रंग ही मेरे मन को भा गया है !! अब चाहें कोई विष भी पिलाये मैं पी लूँगी ...अमृत समझ कर ...और सच तो ये है कि वो सच में प्रेम अमृत ही बन जाएगा और अमर कर देगा मेरा प्रेम ....क्योंकि यह प्रेम ही अब मेरा जीवन है.....इसमें बेकरारी में भी करार है... विरह में भी मिलन है और इंतजार में भी आस है .....प्रिय ओ मेरे प्रिय ......
पिया के रंग रंग लीन्हा अंग अंग और आत्मा तक >>><<<<
क्रमशः
सीमा असीम

Comments
Post a Comment