मिलन का महीना
अक्तूबर की इस उदास शाम में लिख रही हूँ
एक कविता
शाम उदास क्यों है और अक्तूबर भी
इस मौसम में ही तो धरती फूलों से लदने को तैयार होती है
शरद पुर्णिमा का चाँद भी
आसमां में निकलता है
खूबसूरत हसीन मौसम अंगड़ाई लेने लगता है
इंतजार की नन्ही कोपलों के दिनों में
ताजा अंखुआए ख्वाब आँखों में सजने लगते हैं फिर
अक्तूबर तो कभी उदास नहीं होना चाहिए
क्योंकि यही तो वह महीना है जब हम सदियों के बिछुड़े हुए मिले थे
याद है न वह अक्तूबर की खुशहाल सुबह
वह खुशगवार शाम
जब हमने पहली बार एक दूसरे का हाथ पकड़ा था
तुमने कितने वादे किए थे
अपने आर्लिंगन में लेते हुए
मेरी आत्मा को चूमकर
और बना लिया था अपना
यह मिलन का महीना है न
तो शायद इसलिए ही उदास है यह शाम
और यह अक्तूबर का महीना भी !!
सीमा असीम
अक्तूबर की इस उदास शाम में लिख रही हूँ
एक कविता
शाम उदास क्यों है और अक्तूबर भी
इस मौसम में ही तो धरती फूलों से लदने को तैयार होती है
शरद पुर्णिमा का चाँद भी
आसमां में निकलता है
खूबसूरत हसीन मौसम अंगड़ाई लेने लगता है
इंतजार की नन्ही कोपलों के दिनों में
ताजा अंखुआए ख्वाब आँखों में सजने लगते हैं फिर
अक्तूबर तो कभी उदास नहीं होना चाहिए
क्योंकि यही तो वह महीना है जब हम सदियों के बिछुड़े हुए मिले थे
याद है न वह अक्तूबर की खुशहाल सुबह
वह खुशगवार शाम
जब हमने पहली बार एक दूसरे का हाथ पकड़ा था
तुमने कितने वादे किए थे
अपने आर्लिंगन में लेते हुए
मेरी आत्मा को चूमकर
और बना लिया था अपना
यह मिलन का महीना है न
तो शायद इसलिए ही उदास है यह शाम
और यह अक्तूबर का महीना भी !!
सीमा असीम
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