गतांक से आगे 
रिया.......!! 
अनुभूतियाँ अन्तर्मन की
मेरे मन की पवित्रता शब्दों में रच जाये !
मन मंदिर और प्रेम देवालय बन जाये !!

सुनो प्रिय, आज मन बहुत उदास था॥ न जाने क्यों कुछ अच्छा नहीं लग रहा था... पता नहीं ये कैसी मन की अनुभूतियाँ हैं कि जो हमारे मन को दर्द से भर देती हैं मेरे प्रिय मैं कभी नहीं समझ पाती कि आखिर मेरी क्या गलती थी मैंने क्या गलत किया, नहीं पता, ऐसा क्या हुआ जिसकी बजह से मन उदासी से भर जाता है लेकिन फिर सोचती हूँ कि एक दिन सब सही होगा ...हमारे पास खुशियाँ होगी ॥हम साथ में सच्चे दिल से मुस्कराएँगे ॥तब हम एक दूसरे के सुख में सुखी होंगे और दुख कहीं नहीं होंगे ॥शायद मेरा विश्वास बना रहे ...शायद ये पीड़ा ॥ये दर्द ॥ये उदासी ॥ ये दुख सब खत्म हो जाये ॥ या शायद  मेरा मन यूं ही परेशान रहेगा... मैंने तो अब अपने मन को हर तरफ से हटा कर अपनी आँखेँ बंद कर ली और खुद के भीतर ही उतर गयी हूँ ....इन गहराइयों में उतरते ही मेरी चाहत का रंग पहले से और भी गाढा होता जा रहा है,,दिन पर दिन और भी निखरता जा रहा है मेरी चाहत (प्रेम )  मेरा जीवन नहीं बल्कि अब मेरा जीवन ही चाहत (प्रेम )  बनता जा रहा है और ये दुखों का अनुभव ही सुखों का कारण बन जाएगा ....जाको विधि पूरन सुख देहीं, ताकी मति निर्मल कर देहीं....सुनो मेरे प्यारे प्रियतम मुझे यह लगता है कि दुनियाँ में कुछ भी गलत होता ही नहीं या कुछ गलत होता भी है तो शायद वो भी अच्छे के लिए ही होता है ...बस इसी तरह से अपने मन को समझा लेती हूँ  और समझाना भी खुद को खुद ही तो पड़ता है ....क्योंकि तुम मेरे भीतर ही तो रहते हो मेरा ही अक्स बनकर ॥असाधारण चुप्पी साधे बैठ गए मन के कोने में दिल की गहराइयों में उतरकर ....
मेरे प्रिय कोई शिकवा ही नहीं तुमसे तो क्या कहूँ 
बस दर्द भर जाता है तो कागज पर लिख देती हूँ !! 
क्रमशः
सीमा असीम

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