काव्य
चमक प्रेम की
प्रेम की चमक मेरे चेहरे पे चमकती है
प्रेम की खुशबू से मेरी जिंदगी महकती है
मिला है यारा मुझे मेरी जान से प्यारा 

शीतलता की पुरवाई सीने में चलती है.
जब कभी तुम बाहों में समां जाते हो
मेरी धड़कती धड़कन में मिल जाते हो
पिघलने लगते हैं जज़्बात बर्फ के फाहे से
हर जख्म पर मरहम सा लगा जाते हो
नशा प्रेम का यह हर नशे पर भारी है
अपनी जान भी सनम तुझ पर बारी है

कभी आह जब होठों से निकल जाती है 
सोचती हूँ क्या मेरी माति मारी है
तेरी साँसे मेरी रग रग में सिमटती हैं
प्रेम की चमक मेरे चेहरे पे चमकती है
सीमा असीम

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