दोहे


तन तपता मन बाँवरा नैनों से बरसे नीर
मौन बजाए बांसुरी कितनी गहरी पीर

उड़ जा मन लेकर पाती तू प्रियतम के पास 

अँसुयन आखर धुल गए फिर ये कैसी आस

ताप से तपती देह औ विरहा आग लगाए
कमजोरी से पाँव धरा पर धरा न जाए

जगती रहती रात भर तारे रहते साथ
चुभती रहती चाँदनी, बड़ी कठिन है रात

मिले तो केवल दो घड़ी, बिछुड़े यूँ बारंबार
प्रीति के इस बाजार में ये कैसा व्यापार

हर पल दिन उंगली गिनु पड़ गए उनमें घाव
तुम रहते परदेस प्रिय मरहम कौन लगाए

प्रेम नदी गहरी बहुत प्रिय कैसे उतरूँ पार 

मैं हूँ मझधार में प्रिय तुम हो गए बेपरवाह

होठों पर तेरा नाम है जपती रहती दिन रात
आँखें रस्ते पर टिकी कब होगा अपना साथ

बन्द करूँ तो आँख में, खोलूँ तो हर ओर
प्रेम के इस खेल में प्रिय जीते तुम चितचोर

मन्दिर दिया जलाए कर, कर ली आंखे बंद
आ जा प्रियतम लौट कर घड़िया बची हैं चंद 



सीमा असीम

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