गतांक से आगे
रिया मुस्करा
मेरे प्यारे प्रियतम, ये दर्द की, प्रेम की अथाह गहराइयाँ मुझे उबरने ही नहीं देती.... कुछ पल को प्रिय कभी तुम हाथ पकड़ कर बाहर निकाल लेते हो फिर उन्हीं गहराइयों में मन उतर जाता है .... दुनियाँ जहां से बेफिक्र हो और गहरे में गोते मारने लगता है ....मेरे प्रिय तुम कभी इस गहराई को नहीं माप पाओगे क्योंकि सागर को तो मापा जा सकता है परन्तु मेरा प्रेम तो उस असीम आकाश की तरह है .जिसकी कोई थाह ही नहीं .फिर ..कैसे नापोगे भला तुम उथले उथले तैरने से ...
मुझसे तुमने एक जहां ही तो छीना है न जाने क्यों ? न जाने किस खुशी के लिए ,,,अरे मेरे प्यारे प्रियतम मैंने तो अपने सारे जहां तुम पर न्योछावर कर दिये हैं, वार दिये हैं सब सिर्फ तुम पर ही ....मेरा प्रेम मात्र भावना या अहसास तक ही अब सीमित नहीं रह गया है... ये तो शाश्वत सत्य सा बन गया है...उन गहरे गहरे जख्मों की भी मुझे कोई परवाह नहीं, जो तुम मुझे अनजाने में दे देते हो ...कभी तुम्हें महसूस होगा या नहीं होगा... इसकी भी परवाह नहीं ...क्योंकि मेरे प्रिय अब मुझे तुमसे कोई भी शिकायत नहीं है ...प्रिय.... बल्कि मैं तो बेहद खुश हूँ इन गहराइयों में ,,,मन को पल भर भी इधर उधर भटकने ही नहीं देती ये दर्द की गहराइयाँ ,,प्रेम की गहराइयाँ ,,,जब बहुत ज्यादा घबरा जाती हूँ ॥एकदम से बेचैन और अकेली तो आवाज लगा देती हूँ और न जाने कैसे तुम्हें खबर भी हो जाती है और तब तुम मेरा हाथ थाम लेते हो .......
और मेरे मन में प्रज्वलित होता हुआ ये प्रेम रूपी दीपक मुझे गहराइयों में भी डूबने से बचाए रखता है .....क्रमशः
सीमा असीम

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