गतांक से आगे
रिया मुस्करा 
                  कहीं दर्द का कोई नामोंनिशान नहीं , दिल की धड़कनें थमी थमी सी, कोई दुख नहीं, न ही किसी तरह की कोई जलन या तृष्णा .....आज ऐसा ही महसूस कर रही थी रिया क्योंकि उसने अपने दिल का सारा भार अपने प्रिय को सौंप दिया था अब वे जैसे चाहें उसे संभालें या कुछ भी करें ! 
हर बात की एक इंतिहां होती है हर  बात का एक वक्त होता है आज उसे यह बात समझ आ गयी थी ...कर्म से बढ़कर कुछ भी नहीं होता सिर्फ निःस्वार्थ मन से अपना कर्म करते रहो ,,,कर्म से बड़ा कोई नहीं ..न जाने फल की आशा क्यों ...लेकिन आज सिर्फ फल की चाह, सिर्फ लालसा, लपस्या और ऐणकेन प्रकारेण सब पा लेना ही व्यक्ति की मानों वृति बन गयी है ! भटकना और गिरने की सारी हदें पार कर देना बस यही  बचा है  आज !
गिरकर संभलना नहीं बल्कि गिरना और गिरते ही चले जाना थोड़े से पाने की चाह में !\


आज रिया को सच में ऐसा महसूस हो रहा था कि अपने मन को वश में करना दुनियाँ को जीत लेने के समान होता है क्योंकि आसान नहीं होता अपने मन को जीतना ! कितने समय से उसने दुनियाँ के हर सुख से खुद को अलग कर लिया था ! उसका सब कुछ सिर्फ उसके प्रेम के लिए ही था और आज उसने अपने निस्वार्थ मन भाव से उसे उनके ही हवाले कर दिया था ! उसका विश्वास पहले से ज्यादा मजबूत हो गया था अपने प्रेम पर ॥वो सही है सच है बस इतना ही बहुत था उसको मुस्कराने के लिए ....
क्रमशः 
सीमा असीम

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