गतांक से आगे
प्रेम मेरी आदत सा बन गया
और मुझे दीवाना बना दिया
सुनो प्रिय,
क्यों तुम मुझे सताते हो ? क्यों रुलाते हो ? क्या तुम जानते नहीं कि मैं तुमसे बात किए बिना पल भर भी नहीं रह पाती तभी तो मैं हर पल में तुमसे मन ही मन बात करती रहती हूँ ...ना जाने कहाँ कहाँ की बातें और तुम कितने ध्यान से सुनते रहते हो >>॥सुनो मेरे प्रिय, क्या तुम्हारा मन नहीं करता मुझसे बात करने का ? देखो कैसे मन खिल खिल सा जाता है बस दो चार बातें करके ही ...वैसे कितना भरा भरा और भारी भारी मन रहता है ...मेरे प्रिय मैं तो सिर्फ तुमसे ही बात करती हूँ... सोते, जागते, खाते, पीते, हँसते, रोते ...कोई समय ही नहीं होता है तुमसे बात करने का ....प्रिय मुझे बताओ न अपने मन की हर बात ....वो हर बात जो तुम्हारे मन में है... क्या तुम नहीं चाहते कि मैं तुम्हारी राजदार बन जाऊँ? प्रिय मेरा विश्वास करो मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ ॥सिर्फ तुम्हारी ... इस दुनियाँ में रहकर भी इस दुनियाँ की नहीं हूँ ..... मैंने अपनी सुध बुध सब खो दी है ...न तन की परवाह है न अपने मन की, वो तो तुममें ही हर वक्त रमा रहता है ...बेबस और लाचार सी हो गयी हूँ ,, अपना दिल हार के ....एक तेरा नाम और एक तू बस यही याद रह गया है...जैसे कोई जादू सा हो गया है
... क्या तुम समझते नहीं हो या जान बूझकर तुम अनजान बन गए हो ... क्या मैं मर जाऊँगी तब तुम्हें अहसास होगा ...मेरी दिवानगी की इतनी सजा भी मत दो .... मत दो प्रिय ... कहीं मेरी यह सजा तुम्हारी सजा न बन जाये ... कहीं सच में ऐसा ही न हो जाये ....
क्योंकि वो रब सारे रास्ते खोल देता है ...वो रब जानता है मेरा दिल ॥मेरी भावनाए ...ये जो प्रेम है न, यह मेरी मर्जी से नहीं, तुम्हारी मर्जी से नहीं, दुनियाँ की मर्जी से भी नहीं ...यह तो रब का कमाल है ....तभी तो मैं अकेले होकर भी अकेली नहीं हूँ ....जब मैं रोती हूँ तो वो मेरे आँसू पोछते हुए कहता है न रो ॥तू बस सब्र कर ....तू हौंसला रख ...देखना तेरी मर्जी एक दिन रब की मर्जी होगी .....मेरे प्रिय मैं बस इसी तरह अपने मन को समझाती हूँ ...कैसे बात करते करते गले लग कर रोने को दिल करने लगता ...कैसे यह पूरी दुनियाँ अजनबी सी बन गयी है ....क्या करूँ ??? बोलो प्रिय ....तुम ही कुछ बोलो न ..... बोलो मेरे प्रिय ...क्रमशः ....सीमा असीम !!
प्रेम मेरी आदत सा बन गया
और मुझे दीवाना बना दिया
सुनो प्रिय,
क्यों तुम मुझे सताते हो ? क्यों रुलाते हो ? क्या तुम जानते नहीं कि मैं तुमसे बात किए बिना पल भर भी नहीं रह पाती तभी तो मैं हर पल में तुमसे मन ही मन बात करती रहती हूँ ...ना जाने कहाँ कहाँ की बातें और तुम कितने ध्यान से सुनते रहते हो >>॥सुनो मेरे प्रिय, क्या तुम्हारा मन नहीं करता मुझसे बात करने का ? देखो कैसे मन खिल खिल सा जाता है बस दो चार बातें करके ही ...वैसे कितना भरा भरा और भारी भारी मन रहता है ...मेरे प्रिय मैं तो सिर्फ तुमसे ही बात करती हूँ... सोते, जागते, खाते, पीते, हँसते, रोते ...कोई समय ही नहीं होता है तुमसे बात करने का ....प्रिय मुझे बताओ न अपने मन की हर बात ....वो हर बात जो तुम्हारे मन में है... क्या तुम नहीं चाहते कि मैं तुम्हारी राजदार बन जाऊँ? प्रिय मेरा विश्वास करो मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ ॥सिर्फ तुम्हारी ... इस दुनियाँ में रहकर भी इस दुनियाँ की नहीं हूँ ..... मैंने अपनी सुध बुध सब खो दी है ...न तन की परवाह है न अपने मन की, वो तो तुममें ही हर वक्त रमा रहता है ...बेबस और लाचार सी हो गयी हूँ ,, अपना दिल हार के ....एक तेरा नाम और एक तू बस यही याद रह गया है...जैसे कोई जादू सा हो गया है
... क्या तुम समझते नहीं हो या जान बूझकर तुम अनजान बन गए हो ... क्या मैं मर जाऊँगी तब तुम्हें अहसास होगा ...मेरी दिवानगी की इतनी सजा भी मत दो .... मत दो प्रिय ... कहीं मेरी यह सजा तुम्हारी सजा न बन जाये ... कहीं सच में ऐसा ही न हो जाये ....
क्योंकि वो रब सारे रास्ते खोल देता है ...वो रब जानता है मेरा दिल ॥मेरी भावनाए ...ये जो प्रेम है न, यह मेरी मर्जी से नहीं, तुम्हारी मर्जी से नहीं, दुनियाँ की मर्जी से भी नहीं ...यह तो रब का कमाल है ....तभी तो मैं अकेले होकर भी अकेली नहीं हूँ ....जब मैं रोती हूँ तो वो मेरे आँसू पोछते हुए कहता है न रो ॥तू बस सब्र कर ....तू हौंसला रख ...देखना तेरी मर्जी एक दिन रब की मर्जी होगी .....मेरे प्रिय मैं बस इसी तरह अपने मन को समझाती हूँ ...कैसे बात करते करते गले लग कर रोने को दिल करने लगता ...कैसे यह पूरी दुनियाँ अजनबी सी बन गयी है ....क्या करूँ ??? बोलो प्रिय ....तुम ही कुछ बोलो न ..... बोलो मेरे प्रिय ...क्रमशः ....सीमा असीम !!
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