रिया तू मुस्करा

हीरे मोती मेरे मन को न लुभाए 
मैं तो मांगू सनम साथ तेरा
मैं तो तेरी ही हूँ सनम, 
ओ सनम, ये मेरी आँखों में आज ये अश्क कैसे हैं जो बिना थमे न जाने क्यों सुबह से आँखों से बहे जा रहे हैं ....न चाहते हुए भी ....मैं तो मुसकराना चाहती हूँ ...फिर ये क्यों ...सुनो प्रिय यूं रो रो कर मेरी आँखों की रोशनी थोड़ी धुंधली हो गयी है ... तपती हुई रेत पर नंगे पैर चलते हुए के समान अपने विरह में तप रही हूँ ....मैंने तो हर तरफ से अपना मुँह ढांक लिया है बस अपनी वफा का हर फर्ज़ निभाने के लिए .... मैं नहीं जानती कि तुम किस राह पर चल रहे हो ?
प्रिय मैं सिर्फ इतना चाहती हूँ ......तुम्हारी बाहों में अपना दम तोड़ देना ....तुममे समाकर खुद को मिटा जाना ...खत्म हो जाना ...गुम हो जाना सदा सदा के लिए ..
.मैं तुम्हारा हाल पुछना चाहती हूँ प्रिय ,,,मैं तुमसे बात करना चाहती हूँ प्रिय फिर ये कौन सी हिचकिचाहट मुझे रोक दे रही है ? प्रिय मेरा बावरा मन मुझे तेरी जोगन बनाए हुए है ........सनम मैं तुम्हारी उस आवाज को सुनना चाहती हूँ जो मेरे कानों में हर वक्त गूँजती रहती है ....
मैं आज अपने हाल पे घबरा सी रही हूँ ...न जाने क्यों ? न जाने क्यों ?
सीमा असीम 
क्रमशः

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