गतांक से आगे
मैं जान ये वार दूँ, हर जीत भी हार दूं
कीमत हो कोई तुझे बेइन्तेहा प्यार दूं
मेरे प्रिय मैंने प्रेम में सारी हदें तोड़ दी.... सब कुछ तुम्हारे लिए छोड़ दिया ...उसका तुम मुझे ये कैसा सिला दे रहे हो ...कौन सा खेल है ये.... जिस वजह से मेरा सब कुछ छीन लिया तुमने ......किस बात की सज़ा है कि आज करवा चौथ की रात अपने टपकते हुए आंसुओं के साथ तुझे लिख रही हूँ ये सब ...बहुत खुश होगे न तुम ...चलो खुश तो हो ....मेरा क्या है जी लूँगी यूं ही... या मर भी जाऊँगी ॥तो भी क्या फर्क पड़ेगा तुमको ...क्योंकि आज तक नहीं पड़ा तो अब क्या ,,,,मेरे प्रिय तुम मुझे कभी याद मत करना ......कभी एक आँसू मत बहाना ...मत होना कभी उदास तुम... न कभी आहें भरना ....क्या है कि मेरी यह जिंदगी केवल खिलौना भर ही तो है न ...जब चाहें जैसे चाहें खेलो और तोड़ कर फेंक दो ....मेरा दिल रोये,,, आहें भरे .....कोई बात नहीं ....मेरी तो यही दुआ थी न कि तुम खुश रहो 

....अब हमेशा यूं ही खुश रहना ...क्योंकि कहते हैं न... हो तुमको जो कबूल वही बात करेंगे बस इसी राह पर चलती चली आई हूँ अभी तक ....अगर यही तुम्हें अच्छा लगता है .....तो यही सही.... मेरे सनम हमेशा मुझे दुख देकर किसी और के लिए खुशियों का संसार सजाने वाले मेरे प्यारे प्रियतम, अब तुम यूँ ही खुश रहो ......मेरे दिल को आहों
से भर देने वाले.....मेरे प्यारे आसमा ..वैसे एक बात तो बताना मेरी आँखों की नमी, मेरे प्रिय, तुम कैसे कर लेते हो इतना स्वांग ? कैसे तुम वो सब कर लेते हो किसी और के साथ, जो तुम मेरे साथ करते हो ?क्या यही होता है प्यार ? क्या यही होती है सच्चाई ? क्या यही होती है वफा ....ओ मेरे बेवफा सनम तू यूँ ही सदा खुश रहना ....मेरी आत्मा से दर्द की आहें फ़ूट रही है  और तुम सकूँ की नींद सो रहे हो ? ....कैसे ? मेरे प्रिय आखिर कैसे ?
मैं तो हर दिन रखती हूँ तुम्हारे लिए करवाचौथ का व्रत, मेरे प्रिय मैं तो हर दिन मांगती हूँ तुम्हारे लिए लंबी उम्र की दुआ, मैं तो हर दिन चाहती हूँ तुम्हारे लिए खुशी ...मेरी वफ़ा की लाज तुम्हारे हाथ में ही तो है न सनम ........मेरे प्रेम का मान भी तो तुम्हारे हाथ में ही है न .क्रमशः 
सीमा असीम

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