मुक्तक
उदासी हो अगर फिर भी मुस्करा देती हूँ
महकता मन हीरा तेरे ही नाम करती हूँ
बड़ी अजब है ये दुनियाँ खेले कैसे खेल
तेरे मुस्काने पे अपना भोलापन बार देती हूँ !!
क्यों बार बार तुम मुझको आजमाते हो
दे कर दर्द इतना क्यों मुझको सताते हो
गलत क्या किया मोहब्बत ही तो की
बेचेनियां देकर खवाबों में भी जगाते हो !!
सीमा असीम
उदासी हो अगर फिर भी मुस्करा देती हूँ
महकता मन हीरा तेरे ही नाम करती हूँ
बड़ी अजब है ये दुनियाँ खेले कैसे खेल
तेरे मुस्काने पे अपना भोलापन बार देती हूँ !!
क्यों बार बार तुम मुझको आजमाते हो
दे कर दर्द इतना क्यों मुझको सताते हो
गलत क्या किया मोहब्बत ही तो की
बेचेनियां देकर खवाबों में भी जगाते हो !!
सीमा असीम

बहुत सुन्दर
ReplyDeletethanks 😊
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