गतांक से आगे सुनो प्रिय ,,,,लिख रही हूँ प्रेम...उत्साह उमंग से भरे त्योहार दिवाली की रात ...पर मन में न कोई उत्साह... न कोई उमंग....न जाने क्यों हर तरफ उदासी... हर तरफ निराशा ... कुछ भी ऐसा नहीं, जिससे मन में खुशी की हल्की सी लहर आए ....सुनो मेरे प्रियतम, प्रेम पर बहुत गहरी उदासी है ...बहुत ही ज्यादा निराशा .....हाँ प्रेम सिर्फ देना ही जानता है ॥समर्पण ही चाहता है परंतु जब सच हो ,,,,क्या तुम जानते हो, तुम मुझे क्या दे रहे हो ...सिर्फ .दर्द ॥आँसू ... दुख ॥
क्या तुम्हें इस बात का जरा भी अहसास है ....
प्रिय मेरा सच स्वार्थ में निहित नहीं है फिर ये तुम्हारा कैसा स्वार्थ ? प्रिय इतना सताना ...दिल दुखाना सही है ....क्या तुम जानते हो ? मेरा सच क्या है ? प्रिय मैं इस स्वार्थी दुनियाँ की हूँ ही नहीं .... जब कभी तुम ,तुम न रहकर मैं बन जाओगे, तब जानोगे कि प्रेम क्या होता है ॥इसकी तड़प क्या होती है ॥ इसका दर्द क्या होता है ,, इसकी जलन क्या होती है ,, इसका इंतजार क्या होता है ,,, जब आँसू बहते हैं तब जानोगे कि रोना क्या होता है ?? जब कभी सुनोगे मेरे बावरेपन की बातें तब जानोगे प्रेम क्या होता है ? पल पल में नाम लेना ... पल पल में घुटना ,,, पल पल में मरना,, तब जानोगे प्रेम क्या होता है ? क्या तुम्हें पता है प्रेम की भाषा ,,, परिभाषा ,,आशा ,, निराशा ....कैसे जानोगे भला मेरे प्रिय तुम ये सब ...हाँ तुम भी जानते, अगर तुमने भी मेरी ही तरह से प्रेम किया होता ॥ मेरी ही तरह से निभाया होता ,, मेरी ही तरह से अपना सब कुछ बारा होता ...
प्रिय तुम नहीं जानते प्रेम ...क्या तुम जानते हो ? प्रेम क्या होता है ? मुझे जरूर बताना गर तुम जानते हो ....
काश कि ऐसा हो जाये भले ही एक बार हो जाये ...कि तुम मैं बन जाओ और मैं तुम ...तब तुम जरूर समझ जाओगे मेरा प्रेम ...मेरे प्रियतम ।बिलकुल आसान नहीं है प्रेम को निभाना ... मर मर के जीना और घुट घुट के दम तोड़ देना ....क्या तुम कभी समझ पाओगे मेरे इस प्रेम को ... काश कि तुम भी समझ पाते ॥ काश कि तुम भी निभा पाते ,,,काश कि तुम मैं बन जाते ...और मेरे प्रेम की खुशबू से तर हो जाते तब जानते प्रेम क्या होता है ....
तन चन्दन मन धूप बन जाता है
सच हो तो प्रेम प्रार्थना बन जाता है
रोम रोम से उठने लगती है सुगंध
समर्पित प्रेम दिव्य बन जाता है !!
क्रमशः
सीमा असीम
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