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मोहे लगे प्यारे सभी रंग तुम्हारे कि पग पग लिए जाऊँ तेरी बलइयाँ .... तुम सुनो न , सुनते क्यों नहीं , क्या तुम्हें आवाज नहीं आ रही है , क्या तुम अब ऊंचा सुनने लगे हो शायद हाँ तभी तो तुम्हें न कोई आवाज आती है , न कोई अहसास होता है , हाँ तुम्हें कुछ भी महसूस नहीं होता है क्योंकि अगर तुम्हें महसूस हो रहा होता तो तुम न इतने दर्द देते , न ही दुख देते , क्योंकि जब हामरी आँखों में इतने आँसू भर दिये कि मुझे दिखना भी बंद हो गया , दुनिया से मोह ही खत्म हो गया कुछ भी अच्छा नहीं लगना , और खुद में ही खो जाना ,,, वैसे खुद में खोना या खुद को जीना ही ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है ,,,, सीमा असीम 23,2,20

जब तुम कहते हो मैं हूँ न"

 "जब तुम कहते हो मैं हूँ न" जब तुम कहते हो मैं हूँ न, तो डर भी ठहर जाता है। तूफ़ान भी रुक कर पूछता है, अब किसे डराना है। जब तुम कहते हो मैं हूँ न, तो अकेलापन भाग जाता है। एक तुम्हारे होने से ही, सारा जहाँ पास आ जाता है। जब तुम कहते हो मैं हूँ न, तो थका हुआ मन भी मुस्कुराता है। जैसे किसी सूखे पत्ते पर, पहली बारिश का बूँद गिर जाता है। बस यूँ ही कहते रहा करो, मैं हूँ न... मैं हूँ न... तुम्हारे इसी एक शब्द में, मेरा हर जन्म सँवर जाता है। सीमा असीम  6,8,26

मन से हो तुम सिर्फ मेरे ही, तन से कहीं भी

 मन से हो तुम सिर्फ मेरे ही, तन से कहीं भी मन से हो तुम सिर्फ मेरे ही, तन से चाहे जहाँ भी रहो। दुनिया घूम लेना सारी तुम, पर लौट कर मेरे ही मन में बहो। तन की दूरियाँ क्या मायने रखती हैं, जब मन ने तुम्हें अपना बना लिया। लोग कहते हैं पास नहीं हो तुम, मैंने तो तुम्हें साँसों में बसा लिया। तुम रहो जहाँ भी, गिला नहीं मुझको, बस मन की इस डोर को टूटने न देना। शरीर तो मिट्टी है, आनी-जानी है, तुम इस मन के घरौंदे में ही रहना। मैं बंधन नहीं मांगती तन का, मुझे तो तुम्हारे मन का साथ चाहिए। तन से कहीं भी होना तुम, पर मन से — बस मेरे ही पास चाहिए। सीमा असीम  6,8,26

प्रेम को ही जीना है मुझे बार-बार

 प्रेम को ही जीना है मुझे बार-बार प्रेम को ही जीना है मुझे बार-बार, चाहे धूप हो जीवन में या छाँव हो। तुम मिलो न मिलो, ये किस्मत की बात, पर मेरे हर लम्हे में बस तुम्हारा ही नाम हो। प्रेम को ही जीना है मुझे बार-बार, हर जन्म में, हर रूप में, हर सांस में। एक बार नहीं, सौ बार गिरूँ, उठूँ, पर गिरूँ भी तो सिर्फ तुम्हारे एहसास में। मैंने पूछा नहीं खुदा से कभी जन्नत का पता, मैंने माँगा नहीं कोई हिसाब, कोई हक। बस एक दुआ है जो हर बार माँगती हूँ, मेरा इश्क़ रहे, मेरा इश्क़ पाक। लोग जीते हैं दुनिया को, जमाने को, मैं जीती हूँ एक नजर, एक मुस्कान को। प्रेम ही पूजा है, प्रेम ही इबादत, और इसी इबादत में जीना है मुझे बार-बार। जीना तो सब जी लेते हैं एक बार, मुझे तो प्रेम में ही मरना है, और  प्रेम में ही जीना है बार-बार। सीमा असीम  6,8,26

मेरा ही रहेगा

 मेरा ही रहा लोगों ने कहा वो चला गया, मैंने कहा नहीं, वो कहीं नहीं गया। वो मेरी प्रार्थनाओं में रहा, मेरी डायरी के कोने में रहा, मेरी चाय की पहली चुस्की में रहा, और मेरी आँखों की नमी में रहा। दुनिया ने कहा उसे भूल जा, मैंने हँस कर कहा - जो दिल में बस जाता है, वो कभी छूटता नहीं। वो मेरा था, वो मेरा है, और किसी न किसी रूप में वो मेरा ही रहेगा। सीमा असीम 
 वो मेरा था, पर मेरा न हुआ वो मेरा था, पर मेरा न हुआ, एक ख्वाब था, जो पूरा न हुआ। उसकी हँसी मेरी सुबह थी, उसकी बातें मेरी शाम थीं, पर उसकी मंज़िल कोई और थी, हम तो बस रास्ते में मिले थे। मैंने उसे अपना जहाँ माना, उसने मुझे एक पल भर माना। मैंने उसके लिए दुआएँ लिखीं, उसने मेरी दुआओं को कभी पढ़ा ही नहीं। शिकायत नहीं है उससे आज भी, प्यार तो अपना काम कर गया। उसने जाना नहीं, पर मैंने तो प्यार करना सीख लिया। वो मेरा था, पर मेरा न हुआ, पर उससे जो प्यार किया, वो हमेशा मेरा ही रहा।
 प्यार लौट आता है कहते हैं प्यार एक बार जाता है तो लौटता नहीं, पर मैं कहती हूँ, सच्चा प्यार तो लौट आता है। भले ही रूप बदल कर, भले ही किसी और के हाथों में, पर लौटता ज़रूर है। कभी माँ की दुआ बनकर, कभी दोस्त की हँसी बनकर, कभी अपने ही बच्चे की नन्ही उँगली थाम कर। जो प्यार तुमने सच्चे दिल से दिया था, वो व्यर्थ नहीं गया। वो ब्रह्मांड में कहीं जमा हो रहा था, और आज ब्याज समेत तुम्हारे पास लौट रहा है। इसलिए जो गया उसका शोक मत करो, जो आ रहा है, उसके लिए दिल के दरवाजे खुले रखो। क्योंकि प्यार - कभी खत्म नहीं होता, बस लौट आता है।
 अब मैं खुद से प्यार करती हूँ अब मैं किसी से शिकायत नहीं करती, जो जैसा है, वैसा स्वीकार करती हूँ। अब आँखों में आँसू नहीं, सपने रखती हूँ, टूटे दिल से भी हँसना सीख गई हूँ। जो चले गए, उन्हें जाने दिया, जो हैं, उन्हें दिल से अपनाया। अब मैं खुद की सबसे अच्छी दोस्त हूँ, अपनी ही रोशनी में सबसे ज्यादा रोज़ हूँ। क्योंकि मैंने समझ लिया है - खोकर ही पाया जाता है, और टूटकर ही बनना आता है।