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मोहे लगे प्यारे सभी रंग तुम्हारे कि पग पग लिए जाऊँ तेरी बलइयाँ .... तुम सुनो न , सुनते क्यों नहीं , क्या तुम्हें आवाज नहीं आ रही है , क्या तुम अब ऊंचा सुनने लगे हो शायद हाँ तभी तो तुम्हें न कोई आवाज आती है , न कोई अहसास होता है , हाँ तुम्हें कुछ भी महसूस नहीं होता है क्योंकि अगर तुम्हें महसूस हो रहा होता तो तुम न इतने दर्द देते , न ही दुख देते , क्योंकि जब हामरी आँखों में इतने आँसू भर दिये कि मुझे दिखना भी बंद हो गया , दुनिया से मोह ही खत्म हो गया कुछ भी अच्छा नहीं लगना , और खुद में ही खो जाना ,,, वैसे खुद में खोना या खुद को जीना ही ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है ,,,, सीमा असीम 23,2,20

और तुम

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 घने पेड़ों की छाँव हो  नदी का किनारा हो  थोड़ा सा सकूं हो और  हो थोड़े से सिर्फ तुम... सीमा असीम
 राधिका ने काफी उठाई और पीनी शुरू कर दी बेटा एक और ग्राम कप कॉफी उसकी इमेज पर रखकर चला गया था हरप्रीत ने देखा राधिका फिर से काफी में मस्त है और बाहर के नजरों में तो उसका ध्यान फिर से सामने वाली टेबल पर चला गया जहां वह महिला अभी भी खाने में लगी हुई थी और उसकी वही नजाकत धीरे-धीरे चम्मच से लाल सिर्फ करती हुई दाल पीती हुई सब्जी का एक दो टुकड़ा बचा था उसे भी खाया लास्ट आखिर में खीरे का एक टुकड़ा उठकर मुंह में रखा फिर बेटा को बुलाकर कहा बेटा प्लीज बिल ले आओ और ही खाना यहां से उठा लो हरप्रीत ने देखा सारा खाना बच गया ही क्यों था उसे अपनी मैच की तरफ नजर डाली वहां पर बस थोड़ा सा आमलेट बचा था जो राधिका को खाना था उन लोगों ने तो बहुत थोड़ा सही मंगाया जब भी दो लोग खाने वाले थे और यह अकेली एक खाने वाली फिर इतना क्यों मनाया एक मन में हलचल सी मच गई उसके बारे में जानने के लिए इच्छा जागृत हो गई लेकिन कैसे वह तुमसे जानता ही नहीं कभी मिला नहीं कभी बात नहीं की तो ऐसे अजनबी से वह भी क्यों बात करेगी अच्छा भी तो नहीं लगता है ना किसी से ऐसे ही जाकर बोलने लगा बात करने लगा राधिका अभी भी कॉफी पी रही थी रतन ने...

चाँद

आती रही याद जिसकी सुबह से शाम तक  अरे वो तो चाँद है  जो छुप जाता है  सूर्य के उगते ही ||| सीमा असीम सक्सेना 
 गुजर जाता है वक़्त  पर वक़्त गुजरता नहीं  ठहर जाता मन वही  पर वहाँ से कभी हटता नहीं  अब तुम ही बताओ जरा  ऐसा होता है तो क्यों होता है  वैसा क्यों होता नहीं  जो चाहों वो पाओ  दिल क्यों अटका रहता है वहीं.... सीमा असीम  8,2,26

कहानी या किस्सा हूँ कोई

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 मैं तो बस एक कहानी  या किस्सा हूँ कोई   काश तुम भी  एक उपन्यास होते  किसकी कहानी   जो एक बार लिख दी गयीं  बस वही रहती है  कभी नहीं बदलती  जो लिख गई  सो लिख गयीं  क्यों हो गये तुम  एक अखबार से  जो बदल जाता है  हर बार  हर रोज  हर दिन.. सीमा असीम  1,2,26

न दुआ न बद्दुआ

रुला कर मुझे हँसने वाले  दुखा कर दिल मेरा खुश होने वाले   है हम तो अब ईश के सहारे  कि नहीं तू मेरी अब बद्दुआ के भी काबिल.. सीमा असीम  1,2,26

जो अपना है

 पा लिया तो क्या पाया  खो दिया तो क्या खोया  जो अपना है संग है सदा  दूर है जो तो क्या गया  याद किया, क्या याद किया  जो भुला दिया तो क्या भूला  जो रहता है अहसासों में  लौट आया तो क्या लौटा!! सीमा असीम सक्सेना  31,1,26