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मोहे लगे प्यारे सभी रंग तुम्हारे कि पग पग लिए जाऊँ तेरी बलइयाँ .... तुम सुनो न , सुनते क्यों नहीं , क्या तुम्हें आवाज नहीं आ रही है , क्या तुम अब ऊंचा सुनने लगे हो शायद हाँ तभी तो तुम्हें न कोई आवाज आती है , न कोई अहसास होता है , हाँ तुम्हें कुछ भी महसूस नहीं होता है क्योंकि अगर तुम्हें महसूस हो रहा होता तो तुम न इतने दर्द देते , न ही दुख देते , क्योंकि जब हामरी आँखों में इतने आँसू भर दिये कि मुझे दिखना भी बंद हो गया , दुनिया से मोह ही खत्म हो गया कुछ भी अच्छा नहीं लगना , और खुद में ही खो जाना ,,, वैसे खुद में खोना या खुद को जीना ही ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है ,,,, सीमा असीम 23,2,20
तुम जब तुम आए,  तो लगा जैसे प्रेम ने मेरा हाथ थाम लिया.. मैंने कुछ नहीं कहा, बस तुम्हें देखा, और  मेरे भीतर कहीं एक दिया जल उठा... तुम्हारे बिना ये जीवन कितना सूना सूना  तुम मिले तो जैसे  हर साँस में प्रेम घुल गया... मैं कविता क्या लिखूँ, तुम ही तो मेरी सबसे सुंदर कविता हो प्रिय.. सीमा असीम 
 बेवफा के चेहरे पर कितनी सच्चाई दिखती थी  मानों वो खुदा का ही दूसरा रूप हो....
 दरअसल वो सबका होना चाहता था इसलिए वो न मेरा था न ही किसी और का.
 काश एक ऐसा शब्द जो हर किसी के मन में एक बार जरूर आता है मेरी मां में आता था मैं बार-बार इस शब्द को लिखती थी काश ,?  जब एक बार तुमने इस शब्द को मेरी रचना में देखा तो तुमने कहा था एक कांच क्यों हटा दो काश उसे दिन के बाद मैं किसी भी रचना में काश लिखना छोड़ दिया था कभी लिखने का मन भी करता तो तुम्हारी बात याद आ जाती थी और मैं उसे नहीं लिखती थी, पर आज तो मेरा मन कर रहा है कि मैं  इस शब्द को लिखूं कि काश , तुमने मुझे ना कहा होता काश मत लिखो, या मैं तुम्हारी बात ना सुनी होती नहीं मानी होती तुम्हारी बात.... सीमा असीम 
 आज की बात आज मैंने फिर खुद को याद दिलाया, कि ताज सिर पर हो तो ज़िम्मेदारी भी बड़ी होती है। मैं बिना मेहनत के कुछ नहीं चाहती। जो मिलेगा, अपनी लगन से मिलेगा। थकूँगी, पर रुकूँगी नहीं। मैं सिर्फ़ एक नाम नहीं, मैं एक कोशिश हूँ, जो हर दिन बेहतर हो रही है। • सीमा
उसका झूठ झूठ भी कितना सच्चा बोला था उसने, कि हमने सच को भी झूठ मान लिया। कहता था — तुम सी हो, तुम्हारे बिना मर जाऊँगा। आज देखो, हमारे बिना भी जी रहा है, और हम उसी झूठ पर आज भी जी रहे हैं। उसके झूठ में भी एक अदा थी, सच से ज्यादा मीठी सदा थी। हम लुट गए उस सदा पर, और वो जीत गया अपनी अदा पर। अब किसी के सच पर भी यकीन नहीं आता, जब से उसका झूठ सबसे हसीन लगा था।
है खुद पर यकीन इतना कि खुद के लिए, आसमान से तारे खुद ही तोड़ लाऊंगी एक दिन। ना किसी के इंतज़ार में आँसू बहाऊँगी, अपनी रोशनी खुद ही बन जाऊँगी एक दिन। जो छोड़ा था मुझे अंधेरे में अकेला, उसे दिखा दूँगी, मैं सूरज बन जाऊँगी एक दिन।