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मोहे लगे प्यारे सभी रंग तुम्हारे कि पग पग लिए जाऊँ तेरी बलइयाँ .... तुम सुनो न , सुनते क्यों नहीं , क्या तुम्हें आवाज नहीं आ रही है , क्या तुम अब ऊंचा सुनने लगे हो शायद हाँ तभी तो तुम्हें न कोई आवाज आती है , न कोई अहसास होता है , हाँ तुम्हें कुछ भी महसूस नहीं होता है क्योंकि अगर तुम्हें महसूस हो रहा होता तो तुम न इतने दर्द देते , न ही दुख देते , क्योंकि जब हामरी आँखों में इतने आँसू भर दिये कि मुझे दिखना भी बंद हो गया , दुनिया से मोह ही खत्म हो गया कुछ भी अच्छा नहीं लगना , और खुद में ही खो जाना ,,, वैसे खुद में खोना या खुद को जीना ही ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है ,,,, सीमा असीम 23,2,20
मैं प्रेम में हूँ हाँ, मैं प्रेम में हूँ, और अब मुझे सब सुंदर लगता है, हवाएँ भी गीत गाती हैं, और धूप भी मीठी लगती है। मैं प्रेम में हूँ, इसलिए आईने में खुद को ज्यादा देखती हूँ, हर बात पर मुस्कुराती हूँ, बिना वजह के। ये प्रेम ने क्या किया, दिल को इतना कोमल कर दिया, कि अब हर धड़कन बस, उसी का नाम लेती है। हाँ, मैं प्रेम में हूँ, और यही मेरे जीवित होने का, सबसे सुंदर प्रमाण है।
 यह प्यार क्यों होता है पता नहीं यह प्यार क्यों होता है, बिना पूछे, बिना बताए, बस हो जाता है। न शक्ल देख कर होता है, न नाम देख कर, ये तो बस एक एहसास है, जो दिल को छू जाता है। कभी एक बात से हो जाता है, कभी एक मुस्कान से, और कभी तो बस, किसी के होने भर से। ये प्यार क्यों होता है, इसका जवाब किसी के पास नहीं, बस इतना पता है, जब होता है, तो ज़िंदगी खूबसूरत लगने लगती है।
 चलो फिर से किशोरी बन जाते हैं, जब प्रेम का मतलब बस आँखों-आँखों में बात होती थी, एक छोटी सी चिट्ठी, और दिन भर की मुस्कान। चलो फिर से वो बचपन जीते हैं, जहाँ प्रेम में कोई हिसाब नहीं था, न कल की चिंता, बस आज में जीना था। न कोई दिखावा, न कोई दुनियादारी, बस एक सच्चा, सादा, सा पहली बारिश जैसा प्रेम। हाथ में हाथ हो या न हो, दिल में तो प्रेम है न, तो चलो, फिर से उसी मासूमियत से प्रेम करते हैं।
 किशोरी आँखों में जो एक सपना जगा था, वो आज भी इस दिल में वैसा ही सजा है। वो पहली धड़कन, वो पहली सी लकीर, समय बीता, पर न मिटी वो तस्वीर। लोग कहते हैं इश्क़ उम्र देखता है, पर इश्क़ तो बस दिल में ही बसता है। वो किशोरी आज भी कहीं भीतर रहती है, तेरे नाम की माला आज भी कहती है। शेष फिर क्या बचा? बस यही तो बचा है, प्रेम... जो हर जन्म में सिर्फ़ तेरा ही रहा है।
 शाम होते ही प्रेम मेरी आँखों में उतर आता है  मेरे मन में अहसास जगा जाता है  जैसे शाम को दिया जलता है,  बस वैसे ही उजाला कर जाता है। तुम्हें देखना प्रेम नहीं, तुम्हें सोचते हुए मुस्कुरा देना प्रेम है, तुम्हारा नाम सुनते ही अंदर कहीं कुछ खिल जाना प्रेम है मैं नहीं चाहती चाँद-तारे, न वादे बड़े-बड़े, बस तुम रहो, मेरे बुरे दिन में, मेरी थकी शाम में, मेरी खाली दोपहर में, मेरे पास। अगर कभी पूछो कि कितना चाहती हूँ, तो गिन नहीं पाऊँगी, बस इतना जान लो — जब तक साँस है, तुम हो, और जब तक तुम हो, मैं हूँ... तुम हो मेरे ही सदा ही  सीमा असीम  11,8,26
 तुम्हें चाहा — जैसे धूप में कोई साया चाहे, जैसे थकी आँखें कोई ख्वाब चाहें, बिना जाने, बिना समझे, बस दिल ने कहा बस तुम चाहिए मुझे  तुम्हें माँगा हर दुआ में, हर प्रार्थना में, खाली हाथों की हर याचना में, रब ने सुनी तो होगी मेरी सदा, जो तुम मेरी लकीरों में आये  तुम्हें पाया — तो लगा ज़िंदगी मिल गई, अधूरी सी जो थी, वो पूरी खिल गई, तुम मिले तो इश्क़ को नाम मिला, तुम हो तो हर लम्हे को मुकाम मिला, चाहा था, माँगा था, पा लिया तुम्हें, अब बस तुम्हीं में उम्र तमाम हो जाए... सीमा असीम  11,8,26
 इश्क़ वो नहीं जो तुम्हें बेचैन कर दे, इश्क़ वो है जो तुम्हारी बेचैनी में तुम्हारे माथे पर हाथ रख दे। इश्क़ में हिसाब नहीं होता, कौन कितना झुका, कौन कितना चला, इश्क़ में बस इतना याद रहता है कि सामने वाला हँसा तो दिन बन गया... सीमा असीम  10,8,26