न जाने कितनी राते हैं मेरी तुम्हें याद करते हुए गुजर जाती है जानती हूं कि तुम मेरे हो और सिर्फ मेरे ही हो क्योंकि मन जिसके पास है बस वही तो उसका अपना है मेरा मन हमेशा तुम्हारे पास है और तुम्हारा मेरे पास ऐसा हो ही नहीं सकता कि मेरा मन तुम्हारे पास लगा रहे और तुम्हारा मेरी तरफ ध्यान ही ना जाए कितना घबराहट होती है दिन भर में कितनी ही बार जाकर तुम्हें देख लेती हूं और फिर मन को समझ लेती हूं कभी दो बूंद आंखों से छलका लेती हूं और अपनी आंखों की जलन को मिटा लेती हूं अक्सर ऐसा होता है कि पल भर को भूलने की कोशिश करती हूं पर मेरी कोशिश हमेशा नाकाम हो जाती है और तुम्हारी याद मेरे मनमस्तिष्क पर कब्जा जमा लेती है और तुम्हें, मेरा और मुझे तुम्हारा बनाए रखती है यूँ ही सदा या जन्मों जन्मान्तरों के लिए... सीमा असीम 27,2,25
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