रिया तू मुस्करा ...


मन मेरा,,, मन पिया का,,, दोनों रंगे एक रंग .....ओ मेरे प्रीतम,, तुमने अंजाने में जो दर्द, जो तकलीफ दी है उसका शायद तुम्हें अंदाजा भी नहीं है न ....जिसमें न मुझसे जिया जाता है न ही मरा जाता है.....यह कैसी घुटन सी है .....ये कैसी स्वांस थम सी रही है .....सुबह भट्टी के समान तपते बदन को किस तरह से उठाया बिस्तर से ....न जाने ये कैसा नशा जो घूम रहा है पूरा संसार मेरे आसपास ...... कितनी कमजोरी है ....पता नहीं क्यों .... ये री मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय ॥....
.उंगली में पहना नगीना, सरक, सरकने को, गिरने को ......बहुत संभाला... बहुत निखारा... बहुत तराशा... कब तक और कब तक, आखिर कब तक ......इस कमजोर बदन से नहीं संभाला जाएगा ....जिसे जिस गति जाना है वो जाएगा .....
न कोई अहसास ....न कोई भ्रम ....न कोई शिकवा,,,, न कोई शिकायत 
.......अब सहेजा है अपने मन में ......मैंने अपना प्रेम ......न उसके गिरने का डर ...न ही कभी खोने का डर,,,, न ही कभी किसी से अपमानित होने की आशंका ......
कस्तुरी कुंडल बसे....मृग ढूँढे जग मांही .......
मेरा पवित्र निशछल प्रेम ....इस छलाबे, दिखाबे और स्वार्थ की दुनियाँ से घबरा गया है ......तड़प सा गया है .....पल पल दुहाई मांगता मेरा प्रेम ....सरेआम नीलाम हो रहा है ....
लो बांध ली मैंने अपनी डोर मन की मन से .......और छोड़ दी सब आस ....हार के अपना सबकुछ ....
क्रमशः 
सीमा असीम

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