गतांक से आगे
रिया मुस्करा
मेरे प्रियतम ,मैं नहीं जानती कि मैं सही हूँ या गलत हूँ क्योंकि मैं सिर्फ प्रेम में थी, हूँ और रहूँगी सिर्फ तुम्हारे प्रेम में ...जब हम प्रेम में होते हैं तब सिर्फ प्रेम में होते हैं हमें आसपास का सही गलत का कुछ भान ही नहीं होता ....मेरे प्रिय तुम्हें पता हैं न, मैं तुम्हारे प्रेम में हूँ सिर्फ तुम्हारे प्रेम में और मैं सिर्फ तुम्हारी प्रेमिका हूँ ...न मेरा किसी और से कोई नाता है ...न किसी और से कोई रिश्ता है... न मैं किसी की बेटी हूँ ....न बहन न पत्नी और न ही माँ ...मैं सिर्फ प्रेमिका हूँ तुम्हारी ...मेरा सारा समय ...मेरे सारे कर्म सिर्फ तुम्हारे लिए हैं...मैंने अपना सबकुछ तो सिर्फ तुम्हें ही समर्पित कर दिया है... अब तुम चाहें मान दो, सम्मान दो या अपमान ... किसी और से भी मेरा अपमान कराते हो तो वो मेरा नहीं प्रिय आपका अपमान है .....मेरा तो मुझ में कुछ बचा ही नहीं है ॥
जो कुछ है सो तोर ...
मान, अपमान, पद ,प्रतिष्ठा .....सब तुम्हारे हाथ में ...
सुनो प्रिय ...अब तुम्हारा दिया हुआ ये विरह, दर्द, दुख, सबकुछ स्वीकार है ....मेरे प्रेम के साक्षी मेरी अंतरात्मा, पूरा ब्रह्मांड और प्रकृति है .....
मैंने हर हाल में अपने प्रेम को बचाया है ॥ तुम्हारे साथ होने या न होने के बाद भी इसे सच्चे दिल से सभाले रखा ...अपने पवित्र प्रेम को अपनी पवित्र आत्मा से निभाया ..हर तकलीफ और मुश्किलों से गुजरते हुए ....
मेरे प्रिय बस एक गुजारिश है वो जो हमारा प्रेम का मंदिर है ...जो मैंने दिन रात की दुआओं के बाद उसे आकार रूप दिया है॥ जिसकी रक्षा चारो तरफ से देव और प्रकृति कर रही है... उसे कभी अपमानित मत करना .....वहाँ पर खिलते हुए फूलों को कभी भी मत मुरझाने देना ......प्रिय मेरा प्रेम सिर्फ प्रेम भर नहीं है ये तपस्या है ॥सच्ची तपस्या ....इसे भंग मत करना ....मेरे प्रेम की इतनी न परीक्षा लो और न ही मुझे इतनी सजा दो ....क्योंकि मुझे दी हुई हर सजा... तुम्हारे जिम्मे आ जाती है ....और मेरे सनम मैं तुम्हें कोई भी तकलीफ नहीं देना चाहती....
काश कि ये आदाब-ए -वफा तुम भी निभाते .....क्रमशः
सीमा असीम
रिया मुस्करा
मेरे प्रियतम ,मैं नहीं जानती कि मैं सही हूँ या गलत हूँ क्योंकि मैं सिर्फ प्रेम में थी, हूँ और रहूँगी सिर्फ तुम्हारे प्रेम में ...जब हम प्रेम में होते हैं तब सिर्फ प्रेम में होते हैं हमें आसपास का सही गलत का कुछ भान ही नहीं होता ....मेरे प्रिय तुम्हें पता हैं न, मैं तुम्हारे प्रेम में हूँ सिर्फ तुम्हारे प्रेम में और मैं सिर्फ तुम्हारी प्रेमिका हूँ ...न मेरा किसी और से कोई नाता है ...न किसी और से कोई रिश्ता है... न मैं किसी की बेटी हूँ ....न बहन न पत्नी और न ही माँ ...मैं सिर्फ प्रेमिका हूँ तुम्हारी ...मेरा सारा समय ...मेरे सारे कर्म सिर्फ तुम्हारे लिए हैं...मैंने अपना सबकुछ तो सिर्फ तुम्हें ही समर्पित कर दिया है... अब तुम चाहें मान दो, सम्मान दो या अपमान ... किसी और से भी मेरा अपमान कराते हो तो वो मेरा नहीं प्रिय आपका अपमान है .....मेरा तो मुझ में कुछ बचा ही नहीं है ॥
जो कुछ है सो तोर ...
मान, अपमान, पद ,प्रतिष्ठा .....सब तुम्हारे हाथ में ...
सुनो प्रिय ...अब तुम्हारा दिया हुआ ये विरह, दर्द, दुख, सबकुछ स्वीकार है ....मेरे प्रेम के साक्षी मेरी अंतरात्मा, पूरा ब्रह्मांड और प्रकृति है .....
मैंने हर हाल में अपने प्रेम को बचाया है ॥ तुम्हारे साथ होने या न होने के बाद भी इसे सच्चे दिल से सभाले रखा ...अपने पवित्र प्रेम को अपनी पवित्र आत्मा से निभाया ..हर तकलीफ और मुश्किलों से गुजरते हुए ....
मेरे प्रिय बस एक गुजारिश है वो जो हमारा प्रेम का मंदिर है ...जो मैंने दिन रात की दुआओं के बाद उसे आकार रूप दिया है॥ जिसकी रक्षा चारो तरफ से देव और प्रकृति कर रही है... उसे कभी अपमानित मत करना .....वहाँ पर खिलते हुए फूलों को कभी भी मत मुरझाने देना ......प्रिय मेरा प्रेम सिर्फ प्रेम भर नहीं है ये तपस्या है ॥सच्ची तपस्या ....इसे भंग मत करना ....मेरे प्रेम की इतनी न परीक्षा लो और न ही मुझे इतनी सजा दो ....क्योंकि मुझे दी हुई हर सजा... तुम्हारे जिम्मे आ जाती है ....और मेरे सनम मैं तुम्हें कोई भी तकलीफ नहीं देना चाहती....
काश कि ये आदाब-ए -वफा तुम भी निभाते .....क्रमशः
सीमा असीम

Comments
Post a Comment