गतांक से
आगे
न जाने क्या हुआ है मुझे आजकल ? मैं नहीं जानती ,,लेकिन मैं परेशान सी हूँ ,,बहुत दुखी सी ...न जाने क्यों ऐसा लगता है... जैसे सब गलत हैं ...सब झूठ हैं ,,, न जाने क्यों किसी पर विश्वास ही नहीं... किसी पर भरोसा ही नहीं ...इस दुनियाँ में अब मेरा दिल नहीं लगता ॥मैं इस दुनियाँ को छोड़ कर उस दुनियाँ में जाना चाहती हूँ ॥जहां न छल हो ...ना कपट हो ...सब को सबसे प्रेम हो ,,,किसी को किसी से नफरत न हो ...कोई किसी को दुख न दे ...मैं मर जाना चाहती हूँ ...मेरी आत्मा कराह उठती है ...ये कैसी तकलीफ है / प्रिय मुझे इस कष्ट से निकालो ,,,प्रिय मुझे जीना है अभी ... इस तरह नहीं मरना चाहती ,,, हम अगर प्रेम करते हैं तो क्या गलत है ,,क्या प्रेम को खामोश कर सकते हो ? क्या इसके प्रवाह को रोक सकते हो ? कितनी बन्दिशें लगाओगे ? कितने रास्ते बंद करोगे ? प्रिय तुम ऐसा क्यों कर रहे हो ? क्यों ? आखिर क्यों ? मेरे प्रेम को अभी और कई मुकाम पार करने है और बुलंदियों तक पहुँचना है ...प्रिय मेरा प्रेम ,,,
घड़ी चढ़े, घड़ी उतरे वो तो प्रेम न होय !
अघट प्रेम ही हृदय बसे, प्रेम कहिए सोय !!
मेरा दिल हर पल में तुम्हें पुकारता है ,,,मेरा रोम रोम तुम्हारा नाम लेता है ....प्रिय कहाँ हो तुम ? प्रिय मैं तुम्हें ढूंढ रही हूँ ...क्या तुम कहीं खो गए हो ? क्या तुम जानते
हो मेरे लब मुसकराते मुसकराते थम जाते हैं ,,,,उदासी में लिपटे लब मुस्कराना चाहते हैं ...मेरे प्यारे प्रियतम मुझे अपनी वही प्यारी मुस्कान चाहिए जो हमेशा मेरे लबों पर रहती थी ....प्रिय मेरा प्रेम नदी की धारा की तरह प्रवाहित हो रहा है इस पर बांध मत बनाओ ... इसकी धार मत रोको ...इसे बहने दो.....बस इसे रास्ता दे दो क्योंकि प्रेम कभी बंधन नहीं स्वीकार करता....अगर इसे रोकोगे तो न जाने क्या होगा ....न जाने क्या ?
प्रिय सच्चे प्रेम की प्रकृति भी वैसी ही है । वह बांधती नहीं, वह रोकती नहीं, वह अधिकार नहीं जताती बस सच्चा प्रेम अपनी ही धुन मे मगन होकर आनंद में डूबा रहता है ......ये तो नूर की बूंद है यूं ही बहा करती है .....क्रमशः
सीमा असीम
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न जाने क्या हुआ है मुझे आजकल ? मैं नहीं जानती ,,लेकिन मैं परेशान सी हूँ ,,बहुत दुखी सी ...न जाने क्यों ऐसा लगता है... जैसे सब गलत हैं ...सब झूठ हैं ,,, न जाने क्यों किसी पर विश्वास ही नहीं... किसी पर भरोसा ही नहीं ...इस दुनियाँ में अब मेरा दिल नहीं लगता ॥मैं इस दुनियाँ को छोड़ कर उस दुनियाँ में जाना चाहती हूँ ॥जहां न छल हो ...ना कपट हो ...सब को सबसे प्रेम हो ,,,किसी को किसी से नफरत न हो ...कोई किसी को दुख न दे ...मैं मर जाना चाहती हूँ ...मेरी आत्मा कराह उठती है ...ये कैसी तकलीफ है / प्रिय मुझे इस कष्ट से निकालो ,,,प्रिय मुझे जीना है अभी ... इस तरह नहीं मरना चाहती ,,, हम अगर प्रेम करते हैं तो क्या गलत है ,,क्या प्रेम को खामोश कर सकते हो ? क्या इसके प्रवाह को रोक सकते हो ? कितनी बन्दिशें लगाओगे ? कितने रास्ते बंद करोगे ? प्रिय तुम ऐसा क्यों कर रहे हो ? क्यों ? आखिर क्यों ? मेरे प्रेम को अभी और कई मुकाम पार करने है और बुलंदियों तक पहुँचना है ...प्रिय मेरा प्रेम ,,,घड़ी चढ़े, घड़ी उतरे वो तो प्रेम न होय !
अघट प्रेम ही हृदय बसे, प्रेम कहिए सोय !!
मेरा दिल हर पल में तुम्हें पुकारता है ,,,मेरा रोम रोम तुम्हारा नाम लेता है ....प्रिय कहाँ हो तुम ? प्रिय मैं तुम्हें ढूंढ रही हूँ ...क्या तुम कहीं खो गए हो ? क्या तुम जानते
हो मेरे लब मुसकराते मुसकराते थम जाते हैं ,,,,उदासी में लिपटे लब मुस्कराना चाहते हैं ...मेरे प्यारे प्रियतम मुझे अपनी वही प्यारी मुस्कान चाहिए जो हमेशा मेरे लबों पर रहती थी ....प्रिय मेरा प्रेम नदी की धारा की तरह प्रवाहित हो रहा है इस पर बांध मत बनाओ ... इसकी धार मत रोको ...इसे बहने दो.....बस इसे रास्ता दे दो क्योंकि प्रेम कभी बंधन नहीं स्वीकार करता....अगर इसे रोकोगे तो न जाने क्या होगा ....न जाने क्या ?
प्रिय सच्चे प्रेम की प्रकृति भी वैसी ही है । वह बांधती नहीं, वह रोकती नहीं, वह अधिकार नहीं जताती बस सच्चा प्रेम अपनी ही धुन मे मगन होकर आनंद में डूबा रहता है ......ये तो नूर की बूंद है यूं ही बहा करती है .....क्रमशः
सीमा असीम
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