गतांक से आगे प्रेम मेरी आदत सा बन गया और मुझे दीवाना बना दिया सुनो प्रिय, क्यों तुम मुझे सताते हो ? क्यों रुलाते हो ? क्या तुम जानते नहीं कि मैं तुमसे बात किए बिना पल भर भी नहीं रह पाती तभी तो मैं हर पल में तुमसे मन ही मन बात करती रहती हूँ ...ना जाने कहाँ कहाँ की बातें और तुम कितने ध्यान से सुनते रहते हो >>॥सुनो मेरे प्रिय, क्या तुम्हारा मन नहीं करता मुझसे बात करने का ? देखो कैसे मन खिल खिल सा जाता है बस दो चार बातें करके ही ...वैसे कितना भरा भरा और भारी भारी मन रहता है ...मेरे प्रिय मैं तो सिर्फ तुमसे ही बात करती हूँ... सोते, जागते, खाते, पीते, हँसते, रोते ...कोई समय ही नहीं होता है तुमसे बात करने का ....प्रिय मुझे बताओ न अपने मन की हर बात ....वो हर बात जो तुम्हारे मन में है... क्या तुम नहीं चाहते कि मैं तुम्हारी राजदार बन जाऊँ? प्रिय मेरा विश्वास करो मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ ॥सिर्फ तुम्हारी ... इस दुनियाँ में रहकर भी इस दुनियाँ की नहीं हूँ ..... मैंने अपनी सुध बुध सब खो दी है ...न तन की परवाह है न अपने मन...
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Showing posts from October, 2017
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दर्द की नदी बहती है अब मुझमें जिस पर निशा की छाया रहती है न उसमें कोई हलचल न कोई तरंग न कोई उत्साह अब उसमें समुंदर से मिलने का फिर भी बहती रहती है न जाने किस धुन में पोर पोर पीड़ा से दुखता है मानों कोई घाव रिसता रहता है बस प्रेम से भरी आत्मा का प्रकाश है जो लौ जगाए है सत्य की आस्था है फिर भी सिसकती है बहुत सिसकती है मेरी आत्मा चीत्कार करते हुए इस झूठ और छल की दुनियाँ में !! सीमा असीम
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गतांक से आगे रिया मुस्करा सुनो प्रिय मेरे प्रिय तुम खुश हो न ...मैं तो तुम्हें हर बार, हर दफा खुशी ही तो देना चाहती थी और तुम मुझे दुख ... हैं न ...लेकिन फिर भी कोई बात नहीं आप खुश तो हैं यही बहुत है ..मैं जो देना चाहती थी,,, वही सब दिया और जो तुम देना चाहते थे वो तुमने दिया तो इसमें गलत कुछ भी नहीं.. सब सही है ...मुझे पता है ...तुमने मुझे हमेशा गलत समझा मुझसे प्रूफ मांगे ॥लेकिन प्रिय मेरे साथ मेरी प्रकृति है और हमेशा ही रहेगी ,,,,तुम कभी भी देख लेना ॥कभी भी आजमा लेना ...सब कुछ एक दिन सामने ही आता है और आता भी रहा है ...प्रिय मेरा रब जानता है कि मुझे कभी कहीं भी आजतक किसी के भी सामने अपना सर झुकने की नौबत ही नहीं आई और शायद कभी भी नहीं आएगी लेकिन मैंने तुम्हारे सामने अपना सर झुकाया ... तुम्हें अपना रब बनाया ...हर बात मानी खुद को खत्म करके तुम्हें जीवित रखा है लेकिन प्रिय तुमने मुझे कभी इस लायक समझा ही नहीं... चलो कोई बात नहीं ...प्यार में कोई बदला थोड़े ही न होता है ....
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क्यों ये आँख झरती है क्यों ये दर्द होता है हैं क्यों इतनी बेचैनियां क्यों मन उदास होताहै बहुत छोटी है यह धरती हम आसमा के पार जाएँगे तुम साथ देना प्रिय हम हर बाधा पार कर जाएंगे जब शाम ढलती है अश्क छलक आते हैं पोंछ लेती हूँ आँसू कहीं तुम उदास न होना ठंडी हवाएँ आकर अक्सर चूम जाती हैं तुम हो साथ मेरे अहसास दिला जाती हैं निहारती रहती हूँ यूं तस्वीर को तुम्हारी मन में यह अजीब प्यास जागा जाती हैं हर अक्स में नजर तुम आ जाते हो वाकई तुम हो मुड़ मुड़ के देखती हूँ इस कदर याद में खो जाती हूँ कि रास्ता भी भूल जाती हूँ न जाने कब मिलेंगे हम क्या कभी वो मौसम भी आएगा जी रही हूँ किस हाल में दिल का हाल क्या दिल तक पहुँच जाएगा !! सीमा असीम
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उदास दिन की मुस्कान सूरज उग कर भी नहीं उगता है फूल खिल कर भी नहीं महकता है गीली ही रहती है बिना ओस के गिरे ही वो ज़मीं ये खराब मौसम तो नहीं फिर भी मौसम खराब रहता है कि क्यों छु लिया था उस सांझ के ढलते सूरज को अपने ख्वाबों भरे मन से लबों पर खामोशी और आँखों में नमी जलते हुए दिल में धुआँ धुआँ सा रहता है वो तकिया भी राख गिराता है दिन गीला गीला हुआ रहता है कि उदास दिनों में मुस्कान है और यह मुस्कान खनकती बहुत है !! सीमा असीम
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गतांक से आगे रिया मुस्करा आज सुबह से मन में बड़ा सकूँ सा था जैसे कोई खोई खुशी सी मिल गयी हो...आँख खुलते ही मन मुस्करा दिया था...बहुत खुश इतना कि जीभर के खाया और सोई ...लेकिन यह अचानक से क्या हुआ कि आँख से आँसू टपक पड़ा ...न जाने क्यों हुआ, पर हुआ ...मेरे प्रिय मैं तुम्हें सिर्फ प्रेम ही नहीं करती हूँ बल्कि मैं तुम्हारी नस नस में प्रवाहित होती हूँ कभी महसूस कर लेना ,,,स्वयं तुम्हें आभास हो जाएगा .क्योंकि ...ये जो हमारे प्रेम की डोरी है न बड़ी आस्था से बांधी गयी है ,,,और हमारे पवित्र हृदय के उपवन मे इसके बड़े खूबसूरत फूल खिले रहते हैं ! अगर कोई उन फूलों को तोड़ने की कोशिश करता है या तोड़ कर फेंक देता है तो मैं बड़े धैर्य के साथ अपने अशकों से सींचकर नए फूलों को उगा लेती हूँ लेकिन अपनी आस्था को कभी टूटने ही नहीं देती ! मैं यह भी नहीं चाहती कि तुम सिर्फ मुझे ही प्रेम करो पर मैं यह चाहती हूँ कि मेरी आस्था को न टूटने देना ,,,मेरे प्रेम का अपमान न होने देना ,,मज़ाक न बनने देना ... मेरे प्रिय यह मेरे सच्चे दिल कि पुकार है ....बस यह आस्था ही मेरा जीवन का धेयय बन गयी ॥...
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सुनो प्रिय इस ब्रह्म मुहूर्त में लिख रही हूँ तुम्हें ... क्या खुशियाँ इतनी छोटी होती हैं और गम इतने बड़े ...समझ ही नहीं आता कि जरा से अहसास भर से ही मन खुशी से झूम उठता है ...क्या तुम जानते हो प्रेम ऐसा ही होता है जिसे न सरहदों की परवाह, न खुद का ख्याल, न कहने की, न सुनने की जरूरत, न कोई रंग न कोई रूप, बस ये अहसास में पलता है, बिना कहे ही हर भाषा समझ जाता है ..... न जाने क्यों आज तुम पर बहुत प्यार आया है ॥न जाने क्यों आज तुम्हें और करीब कर लेने को जी चाहता है॥ दिल की परतों के सबसे आखिरी छोर तक तुम्हें समा लेना चाहता है ...ये सब कैसे हुआ ? कब हुआ ? नहीं पता ...बस इतना पता है कि तुम मेरे रोम रोम में समा गए हो ॥मेरी स्वांस जब आती है न तो खुद ब खुद तुम्हारा नाम सुनाई देता है ...कभी आना और सुन जाना इन स्वर लहरियों को जो धड़कन के साथ एक मधुर राग अलापती हैं ,,,मेरे प्रिय ॥मेरे प्रीतम !! कि एक तेरा नाम ही जग से प्यारा है कि तू खुद ही कितना प्यारा होगा ....अब तुम हो तो जीवन है ॥हंसी है खुशी है ॥ सु...
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मिलन का महीना अक्तूबर की इस उदास शाम में लिख रही हूँ एक कविता शाम उदास क्यों है और अक्तूबर भी इस मौसम में ही तो धरती फूलों से लदने को तैयार होती है शरद पुर्णिमा का चाँद भी आसमां में निकलता है खूबसूरत हसीन मौसम अंगड़ाई लेने लगता है इंतजार की नन्ही कोपलों के दिनों में ताजा अंखुआए ख्वाब आँखों में सजने लगते हैं फिर अक्तूबर तो कभी उदास नहीं होना चाहिए क्योंकि यही तो वह महीना है जब हम सदियों के बिछुड़े हुए मिले थे याद है न वह अक्तूबर की खुशहाल सुबह वह खुशगवार शाम जब हमने पहली बार एक दूसरे का हाथ पकड़ा था तुमने कितने वादे किए थे अपने आर्लिंगन में लेते हुए मेरी आत्मा को चूमकर और बना लिया था अपना यह मिलन का महीना है न तो शायद इसलिए ही उदास है यह शाम और यह अक्तूबर का महीना भी !! सीमा असीम
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इंतजार इंतजार है अब मुझे कोरा कागज ही सही पर जवाब आए बड़े दिनों से तुम्हारे लफ्जों में खुद को पढ़ा ही नहीं वैसे तो हम तुम्हारा मन पढ़ लेते हैं और पढ़ लेते हैं खामोशी भी फिर भी इंतजार है मुझे, हाँ इंतजार है मुझे, बड़ी बेसब्री से तुम्हारे लिखे को पढ़ने का तुम्हारे लिखे शब्दों मे या एक एक शब्द में खुद को ही तो ढूंढती आई हूँ बार पढ़ती रही हूँ उन शब्दों को दोहराते हुए आज बेचैन हूँ खुद को उन शब्दों में जीवित होने के लिए जो तुम मेरे लिए लिख दोगे शायद मैं पुनःउसी ऊर्जा से भर जाऊँ जो कहीं खो सी गयी है गुम हो गयी है जिसे ढूँढती रहती हूँ हरपल में निर्जीव सी होकर अब तो इंतजार है बस उसी जीवन दान का जो तुम मुझे दे दोगे !! सीमा असीम
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भंवर अब जान गयी है धरा सब समझ गयी है धरा ना जाने कैसे पर समझ आ गयी है आसमां की सच्चाई उसकी हकीकत उसके खामोश रहने पर भी पढ लिया है मन हाँ सब जान और समझ गयी है धरा वो खुद में ही डूबती चली जा रही है तडपती मचलती झटपटाती भंवर में फंसी धरा भूल गयी है स्वयं को ही और उतरती ही जा रही है गहरे और गहरे झुलसते हुए से उस भंवर में उलझते सुलझते ही पा ली है अब उसने सुलझ न उ स उलझन से जो चलती रहती है अनवरत उसके मन में करती रहती है उसकी आत्मा को छलनी वही मिल गया उसका आसमां उस भंवर के मध्य उलझन भरे भंवर के मध्य ही फंसा है उसका आसमां साथ है उसके उसकी धड़कन की तरह बेखबर बेपरवाह सा साथ निभा रहा है उस भंवर में खुद को भी उलझाता चला जा रहा है अपनी प्रिय धरा का साथ निभाने को हर पल हर क्षण हर घडी!! सीमा असीम
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तुम आना मैं अपनी पवित्र आत्मा से पुकारती हूँ तुम्हें तुम आना प्रिय तुम तब आना जब शाम के ढलने पर पंछी अपने दरख्तों के तरफ लौट रहे हो जब सूर्य अपनी सिंदूरी लालिमा के साथ अस्ताचल में समा रहा हो तुम आना प्रिय तुम तब आना जब तारों से पूरा आकाश आच्छादित हो चाँद शरमाता मुस्काता चाँदनी की बाहों में सिमट जाये अंतहीन खुले आकाश के नीचे पूरा जहां सोया हो गहरी नींद में तुम आना प्रिय तुम तब आना जब मस्जिदों में अजान हो रही हो मंदिरों में शंख ध्वनि बज रही हो भोर की पहली किरण फूटने से पहले ओस से गीली हो धरा बस तुम आ जाना प्रिय तुम आ जाना क्षण भर के प्यार के बदले जमाने का असीम दर्द दे जाना उपहार में तुम आना प्रिय तुम आना ! सीमा असीम
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गतांक से आगे रिया मुस्करा दिल में किसी के प्यार का जलता हुआ दिया दुनियाँ की आंधियों से भला ये बुझेगा क्या सुनो प्रिय मैंने तुमसे प्यार किया अपने सच्चे दिल से ...मन की अनंत गहराइयों में उतर कर चाहा.. तो मेरे प्रिय उसका तुमने मुझे ये सिला दिया है ? क्या तुम जानते हो मेरे आँसू पल भर को भी नहीं थमते ...मैं समझ नहीं पाती कि आखिर बेइंतहा प्यार करना क्या इस दुनियाँ में सबसे बड़ा गुनाह है ? मैं कितने समय से देख रही हूँ, पढ़ रही हूँ, महसूस कर रही हूँ ....क्या तुम खिलाड़ी हो ? क्या तुम्हारे लिए प्रेम कोई खेल है समझ ही नहीं आता कि कोई ऐसा क्यों करता है ? क्या किसी की वफा का सिला बेवफाई से देना चाहिए ....समझ नहीं आता आखिर तुम चाहते क्या थे ? मैं तो यही सोचकर बेचैन होती हूँ ॥घबराहट से भर जाती हूँ ,, इतना ज्यादा व्यथित हो जाती हूँ एकदम से बीमार कि बिस्तर से उठा ही नहीं जाता ...न खाना, न पीना, न सोना ,...कुछ जीवन ही शेष नहीं बचाता जैसे जिस्म में ....कि कैसे तुमने किसी और को अपने गले से लगाया होगा ? कैसे तुमने उसका मस्तक चूमा होगा ? क्या यह व्यभिचार ...
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मुक्तक उदासी हो अगर फिर भी मुस्करा देती हूँ महकता मन हीरा तेरे ही नाम करती हूँ बड़ी अजब है ये दुनियाँ खेले कैसे खेल तेरे मुस्काने पे अपना भोलापन बार देती हूँ !! क्यों बार बार तुम मुझको आजमाते हो दे कर दर्द इतना क्यों मुझको सताते हो गलत क्या किया मोहब्बत ही तो की बेचेनियां देकर खवाबों में भी जगाते हो !! सीमा असीम
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प्रेम कहानी गतांक से आगे चलो प्रिय आज एक काम करते हैं ? ? ये दुनियाँ हम दोनों आपस में बाँट लेते हैं ...चाँद सूरज तारे धरती आकाश ये नदिया सबकुछ तुझे दे देती हूँ ॥ फिर तेरे लिए क्या बचा ? मेरे लिए तुम ॥सुनो मेरे प्रिय तुम तो मेरे हो न ? पागल ...मैं तो वैसे भी तेरा ही हूँ ॥ये सबकुछ मुझे देने की क्या जरूरत ? जरूरत है न ॥इतना सारा बोझ संभालते संभालते मैं थक जो गयी थी ! हाहाहा ! वो ज़ोर से हँसता है ! वो उसका मुंह देखकर कहती है ॥अरे पागल इसमे इतना हंसने की क्या बात है जो इतनी ज़ोर से हंस रहा है? अरे मेरी पगली फिर तू दो दिनों बाद कहेगी कि ये सारा बोझ तू अकेले उठाए थक गया होगा, लाओ अब मुझे दे दो और तुम स्वछंद होकर, स्वतंत्र होकर दुनियाँ में घूम आओ ! न न अब नहीं कहूँगी ! क्यों ,, अब क्या हुआ ? क्योंकि अब दुनियाँ में पाप बहुत हैं तो इसका बजन बहुत बढ़ गया है ,,,और यह बोझ मैं भला कैसे उठा पाऊँगी ...? तो मैं इतने सारे पापों का बोझ उठाए फिरूँ ? नहीं प्रिय तुम तो बस पुण्य करो और इन पापों की परवाह करना छोड़ दो .... पुण्य ??? आज के दौर में पुण्य कैसे किया जाता है ? सुनो ...
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क्यों तेरी याद आती है क्यों आँखों में नमी आती है क्यों ये शाम ढलती है दर्द इस कदर बढ़ता है कि मानों जान जाती है ये कैसी मोहब्बत है कि तुम को खबर तक नहीं उँगलियों पर दिन गिनती हूँ पल पल में पल को गिनती हूँ तू इतना भी मसरूफ़ न हो जानम कि मेरी जान जाती है ये कैसी मोहब्बत है कि तेरी याद आती है सनम तेरी याद आती है !! सीमा असीम
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गीत आज प्रिय ये क्या कह गए मुस्करा के मन क्यों रह गए नाचे अंग अंग बनके चंदनियाँ ओ मेरा पिया ओ मेरा सावरिया स्वर्ग सी धरती खिल रही है दिल की दुआएं सज रही है मेरा मन भी खिला दे मेरा मन भी महका दे ओ मेरा पिया ओ सावरिया दिल में अरमा मचल रहे हैं कोयल से कुहक रहे हैं प्रीत की सरिता बहा दे आँखों से नमी हटा से मैं हुई यूं तेरी बावरिया मैं महक रही हूँ लहक रही हूँ झूम झूम कर आसमा छु रही हूँ सजन दिल में छुपा ले इस जग से बचा ले ओढा दे वही धानी चुनरिया सीमा असीम
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इंतजार बहुत समय से मैंने सिर्फ तुम्हें प्यार किया इंतजार नहीं किया याद किया तुम्हें बहुत याद किया इंतजार नहीं किया पर अब मैंने इंतजार करना शुरू कर दिया पलकों के दरवाजे खोल दिये तुम आओ औ ठहर जाओ सदा के लिए हमेशा के लिए और सुनो प्रिय मैं चाहती हूँ तुम कहो कहते ही रहो मैं सुनूँ और सुनती ही रहूँ तुम्हें पता है , न... मैं क्या सुनना चाहती हूं जो तुम कह देते हो कभी कभार अपनी रौ में बहते हुए हाँ बस वही हाँ बस वही !! सीमा असीम .
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कविता सुनो प्रिय मैंने सुना जो प्यार करते हैं वे फूल बनते हैं या तारा फूल महक बांटते हैं हवाओं में घुल जाते हैं सूख जाते हैं और फिर खत्म हो जाते हैं जो प्यार करते हैं तारा बनकर आसमान में चढ़ जाते हैं फूल बने हैं या तारा पास नहीं रहते क्या ये सच है ? न न ये सच नहीं है॥ ये सच नहीं है प्रिय हाँ वे पास नहीं रहते फिर भी दिल में रहते हैं हरदम साथ रहते हैं स्वासों में महकते हैं लब पर सजते हैं आँखों में बसते हैं हम तो तुमसे प्यार करते हैं हाँ हम भी तुमसे प्यार करते हैं !! सीमा असीम