गतांक से आगे .....
रिया तू मुस्कुरा
बाहों में चले आओ, हमसे सनम
क्या पर्दा
सुनो प्रिय मैं तुम्हें कहीं नहीं ढूंढती, कभी भी नहीं क्योंकि मैं तुम्हें पल भर को भी नहीं बिसराती हूँ, हमेशा ही साथ रखती हूँ, कभी गीत बनाकर, कभी गजल बनाकर तो कभी कहानी में ढालकर,या कभी मंच
पर गुनगुनाते हुए या यूं ही कभी मंद मंद मुसकुराते हुए ! मेरी आँखों में जो
तुम्हारा अक्स बसा है ! क्या कभी मेरी आँखों को देखा है तुमने ?
मेरी धड़कने एक ही नाम पुकारती हैं किसी पवित्र
मंत्र की तरह उच्चारित करती हैं ! कितनी अनगिनत कहानियाँ तुम्हारे नाम की मेरे दिल
में लिखी हैं ! जिंदगी में किसी भी मंज़िल की तलाश ही नहीं, न ही किसी रास्ते पर भटकाव, बराबर चलते हुए और कभी
भी पीछे मुड़कर न देखते हुए भी, न ही किसी रास्ते को याद रखते
हुए क्योंकि कहीं और न मन जाता है न ही दिमाग ! पता नहीं क्यों है ऐसा ? लेकिन मेरा सच तो यही है ! मैं जानती हूँ और यह बात तुम भी बहुत अच्छी
तरह से जानते हो इसके बाद भी तुम मुझे आजमाते रहते हो, न
जाने कितनी तोहमते लगाते रहते हो ?
जब कभी मैं
अल्पना बनाती हूँ या कभी कोई चौक पूजा करने के लिए तो मैं वहाँ पर लिख देती हूँ
तुम्हारा नाम, अंजाने में ही दबा देती हूँ बटन फोन कॉल का !
ओहह यह सब क्या है ? यह कैसा दीवानापन है ! नहीं पता ! सच
में मुझे कुछ भी नहीं पता !
मेरे आसपास कोई खामोश हलचल सी बिखर गयी है !!
मेरे आसपास कोई खामोश हलचल सी बिखर गयी है !!
गहराई में जैसा ठहरा हुआ जल होता है न ठीक वैसे ही ! मुझे लगता है कि यह
जो विरह का दंश है न, सब इसी ने जाल बिछाया है ! हर सुख और खुशी होने के बाद भी न जाने कैसी
बेचैनी हर पल में है ! आसमान में नजरे न जानें क्यों और क्या देखती रहती हैं ? किसी जलते या बुझते तारे सा मन दिपदिपाता रहता है,
कभी चमकता है सूर्य की तरह !
मन किसी
यादों के मेले में खोया सा, बावला सा ! होश ही नहीं न अपना न जहां का ! तुम्हारे व्यर्थ के आघात से रूठा
हुआ, मान जाता कब, पता ही नहीं चला कभी !! बस इतना पता है कि यह कैसा बंधन
है जो बंध गया है तुमसे बिना किसी ख़्वाहिश के !
दो पल मिलकर आए थे और सदियों का गम साथ ले आए !
सुनो प्रिय मुझे तुम्हारा यह तोहफा भी कबूल है क्योंकि तुमने जो दिया है .........
बस एक विश्वास सा है मन में कि एक दिन सच में मन खुशी से झूम उठेगा हमारा !!! क्रमशः

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