बहुत शोर मचाता है झूठ
सच शांत होता है !
सच को शब्दों में या
सीमा में नहीं बांधा जा सकता !
सच असीम होता है ! सच को
बुद्धि या विचारों से न तो जान सकते हैं और न ही समझ सकते हैं क्योंकि सच तो स्वतः महसूस हो जाता है ! जब हम
विचारों से मुक्त होते हैं तो हमारी भीतरी चेतना जाग्रत हो जाती है और हमें सच, झूठ का भान करा देती है !
मुझे तो तुम्हारी हर बात का सच्चा
अहसास हो जाता है फिर तुम्हें क्यों नहीं ?
जब कभी तुम मुझे झूठ या गलत कहते हो
तो, यकीनन तुमने मुझे बुद्धि से नाप या तोल लिया
होगा ! कभी अपनी भीतरी चेतना या अंतरात्मा से पूछना कि सच है क्या ? कौन है झूठ ? मैं आपको वाकई गलत लगती
हूँ न ?
वैसे अगर हम किसी की तरफ एक उंगली उठाते हैं तो हमारी तरफ तीन उँगलियाँ उठ जाती है हम कभी यह सोचते ही नहीं बस खुद को हमेशा सही समझते रहते हैं !
एक सुंदर सी लघुकथा से इस बात को समझते हैं …..
सूर्य आकाश के मध्य में आ गया था, मतलब दोपहर का समय था ! एक सुंदर हंस एक सागर से दूसरे सागर की ओर उड़ा जा रहा था, लंबी यात्रा और धूप की थकान से वह भूमि पर उतरकर एक कुएं की पाट पर विश्राम करने लगा ! वह बैठ भी नहीं पाया था कि कुएं के भीतर से एक मेंढक की आवाज आयी, 'मित्र, तुम कौन हो और कहां से आए हो?
वह
हंस बोला, ''मैं एक अत्यंत दरिद्र हंस हूं और सागर पर मेरा निवास है।'' मेंढक का सागर से कभी मिलना नहीं हुआ था। वह पूछने लगा,
''सागर कितना बड़ा है?'' हंस ने कहा, ''असीम।'' इस पर मेंढक ने पानी
में एक छलांग लगाई और पूछा, ''क्या इतना बड़ा?'' हंस हंसने लगा और बोला, ''प्यारे मेंढक, नहीं। सागर इससे अनंत
गुना बड़ा है।'' इस पर मेंढक ने एक और बड़ी छलांग लगाई और पूछा, ''क्या इतना बड़ा?'' उत्तर फिर भी नकारात्मक
पाकर मेंढक ने कुएं की पूर्ण परिधि में कूदकर चक्कर लगाया और पूछा, ''अब तो ठीक है! सागर
इससे बड़ा और क्या होगा?'' उसकी आंखों में विश्वास की झलक थी और इस बार उत्तर के
नकारात्मक होने की उसे कोई आशा न थी। लेकिन,
उस हंस ने पुन: कहा, ''नहीं मित्र! नहीं तुम्हारे
कुएं से सागर को मापने का कोई उपाय नहीं है।''
इस पर,
मेंढक तिरस्कार से हंसने लगा और बोला, ''महानुभाव, असत्य की भी सीमा
होती है?'' मेरे संसार से बड़ा सागर कभी भी नहीं हो सकता!''
सत्य के खोजियों से मेरा ये कहना है क़ि, ''सत्य के सागर को जानना है, तो अपनी बुद्धि के कुओं से बाहर आ जाओ। बुद्धि से सत्य को पाने का कोई उपाय नहीं। सत्य अमाप है। उसे तो वही समझ पाता है, जो स्वयं के सब बांध तोड़ देता है। बन्धनों का कारण ही बाधा है। उनके मिटते ही सत्य जाना ही नहीं जाता वरन् उससे एकाकार भी हो जाता है। उससे एक हो जाना ही उसे जानना है।और आज तक कोई भी उपाय कारगर सिद्ध नहीं हुए है।हां लोगो ने सत्य का भ्रम जरूर पाल रखा है।जिससे आज तक किसी का भला नहीं हुआ।
सत्य के खोजियों से मेरा ये कहना है क़ि, ''सत्य के सागर को जानना है, तो अपनी बुद्धि के कुओं से बाहर आ जाओ। बुद्धि से सत्य को पाने का कोई उपाय नहीं। सत्य अमाप है। उसे तो वही समझ पाता है, जो स्वयं के सब बांध तोड़ देता है। बन्धनों का कारण ही बाधा है। उनके मिटते ही सत्य जाना ही नहीं जाता वरन् उससे एकाकार भी हो जाता है। उससे एक हो जाना ही उसे जानना है।और आज तक कोई भी उपाय कारगर सिद्ध नहीं हुए है।हां लोगो ने सत्य का भ्रम जरूर पाल रखा है।जिससे आज तक किसी का भला नहीं हुआ।
और सच को कभी कहने की जरूरत ही नहीं होती,
वो स्वतः महसूस होता है .....
सीमा असीम
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