क्या किसी को आई लव यू कह देना प्रेम है ? क्या किसी को गले लगा लेना प्रेम है ?क्या किसी के साथ पूरा जीवन बिता देना प्रेम है ? क्या प्रेम कोई संबंध है ?
शायद नहीं ....
क्योंकि प्रेम सीमित नहीं है...प्रेम का असली रूप तो विस्तार है... प्रेम में दो नहीं होते ....हाँ संबंध में होते हैं ....संबंध में अहम होता है .....प्रेम में सिर्फ समर्पण होता है ...हर हाल में बस अपने प्रिय की खुशी .....तभी तो जब हमारे प्रिय को तकलीफ होती है तो आँख नम हो जाती है.....और उसकी खुशी पर मन जश्न सा मनाने लगता है.....हम बिना किसी बंधन के बस उसकी ज़िंदगी जीने लगते हैं .....उसके अहसासों को ही  अपना जीवन  अपनी ऊर्जा मान  लेते हैं ...  बिना किसी शर्त के होने वाला प्रेम कभी  परवाह ही नहीं करता किसी भी बात की ...वो तो बस मगन रहता है हरहाल में अपने मन में बसे प्रिय के साथ .....सीमा असीम

Comments

Popular posts from this blog

मुस्कुराना

यात्रा