गतांक से आगे 
रिया तू मुस्करा
 बड़ा ताज़्ज़ुब होता है कि न तो मेरा प्रेम हारता है, न ही मेरा विश्वास हारता है  !                      हाँ मैं जरूर हार जाती हूँ .........................
प्रिय सिर्फ तुम्हारी खुशी की खातिर  क्योंकि  न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि एक दिन वही  छलकती ख़ुशी तुम मेरे मन में भर दोगे ! और मैं खुशी से चहकती हुई तुम्हारा मुँह चूम लूँगी !  न जाने कहाँ खो जाएगी तब सारी उदासियां ......सुनो प्रिय, मैं रो के बहा दूँगी सारे दर्द ......धो कर सूखा लूँगी सारे जख्म और फिर खुशबू बिखर जाएगी सुगंधित ताजे फूलों की ......
लेकिन अभी जब मैं लिख रही हूँ प्रेम भरे मन और नम आँखों से, तब तुम चैन की नींद सोये हुए होगे, कोई स्वर्णिम दुनियाँ के ख्वाबों में खोये हुए ..........पर समुन्द्र तो कभी भी सकूँ की नींद ले ही नहीं पाता होगा .......लहरों की अनगिनत भयंकर दहाड़ों से घिर कर कितना अशांत जो हो जाता होगा .....
और उसके पास बने वे दीप कितने शांत हो जाते हैं, जब अंधेरा गहरा जाता है .....तुम भी किसी द्वीप की तरह शांत मन से सो रहे होगे, हैं न ? कभी कभी मुझे इतना सुखद आश्चर्य होता है कि तुम्हारे लिए सब कुछ कितना सहज और सरल होता है, मानों तुम्हें कोई भी और किसी भी बात की परवाह ही नहीं ..........और मैं मन में गहरी नदी की तरह रहस्यों को समेटे जाग रही हूँ कि
शायद मुझे निजात मिल जाये इनसे और फूट पड़े फिर से खुशियों का लहराता हुआ सागर ........
दीवानेपन के महकते गुलजार 
दिल में दहकते हैं,
ओ प्रिय ये खुशबू हर तरफ बिखर 
न जाए कहीं !!
सीमा
क्रमशः





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