गतांक से आगे


सुबह सवेरे सूर्य को अर्घ्य देते ही उसकी पहली किरण ने प्रेम की मीठी सी छुअन दे दी आकर, अथाह ऊर्जा से भरा मन मुस्करा दिया  ,,पल पल मन ही मन रटते हुए उस प्यारे नाम के शब्दों के बोल हल्के से कानों में गूंज गए ... समझ नहीं पाती हूँ कभी कभी तुम कैसे जान जाते हो मेरे मन की बात लेकिन प्रिय सच तो यह है कि मैं भी तो समझती हूँ तुम्हें, तुम्हारे मन की हर बात ....बिना कुछ कहे, बिना कुछ सुने ,,,,,प्रेम के पवित्र बंधन में बंधे हमारे मन जिन्हें किसी प्रतिदान की जरूरत ही कब है ....सबसे ज्यादा जरूरी है उन प्यारे लबों की मुस्कान और मन की सच्ची खुशी जो अलग हैं, सबसे अलग ,,,दुनिया का सबसे प्यारा इंसान, मेरे मन में रहने वाला जिसकी खुशी के लिए निसार हैं मेरी हर खुशी,,,,क्या तुम जानते हो प्रिय, छल, कपट, प्रपंच युद्ध से कभी कुछ हासिल हुआ है ? कभी उनको श्रद्धा के साथ याद किया गया है,,,, या उनका नाम लेते वक्त कभी कोई खुश हुआ है ? नहीं न ....बस प्यार के दो शब्दों को जीने वाले इन्सानों ने अपना वर्चस्व हमेशा कायम रखा है न ?

तो फिर कैसी ये मारा मारी है दुनियाँ में ? क्यों लोग पा लेना चाहते हैं सबकुछ ? रिश्ते कभी स्वार्थ का साधन नहीं होते या वे सीढी नहीं होते ऊंचाइयों को पाने के लिए और आत्मीयता का मुखौटा लगाकर भी कभी कुछ हासिल नहीं होता ...और सुनो प्रिय प्रेम तो कभी पाया ही नहीं जाता, प्रेम तो सिर्फ एक तप है, जिसे जिया जाता जाता है, पूर्ण समर्पण के साथ, पूरे सच्चे मन से, असहनीय ताप में तपते हुए .... हे मेरे प्रिय दिव्य प्रेमी दिल में छ्लक्ते लबालब प्रेम में कभी नफरत का भाव नहीं उभरता ......क्रमशः 
सीमा असीम

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