रिया तू मुस्करा

आज दिल न जाने क्यों भरा भरा सा है ? प्रिय तुम्हारी बातें आज बहुत याद आ रही हैं ,,,वो मुस्कराते हुए कहना ...समझाना ...बहुत याद आ रहा है ...कभी न सोचा था, न ही कभी समझा था,,कि प्रिय आपकी याद में यूं भी हालत हो जाएगी .....दीवानगी इस कदर बढ़ जाएगी ...या रब ये कैसा जादू है जो हर पल में अपनी ही धुन में मगन किए रहता है ...छु दिया है तुमने मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व को ....मेरी बंद आँखों की पलकों को चूमकर तुम खवाब बनकर आकर समा गये हो ...न जाने ये कैसा अहसास कि तुम्हारी छूअन से सिहर गया है मेरा एक एक अंग ॥
ओ मेरे प्रिय, ओ मेरे आराध्य मैं तुम्हें अपनी यादों में भरकर लिख रही हूँ हवाओं की देह पर एक प्रेम गीत॥ 
देखना प्रिय, जब पुरवाई चलेगी ...तब शायद वो गीत तुम्हारे कानों में आकर गुनगुनाए और मेरी याद दिला जाये ...मेरी विरह की पीर तब तुम सुन सको और फिर शायद यूं ही मेरी याद में कुछ पल को ही सही पर खो सको, मेरी दीवानगी का आलम समझ सको ...


तन से जुदा हैं भी तो क्या
एक जान हैं हम
एक जान हैं हम
एक जान हैं हम
क्रमशः 
सीमा असीम  

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