रिया तू मुस्करा
सुबह से रात हो गयी और रात गहराती चली गयी ! मैं इंतजार करती रही .... पलकों से उस राह को बुहारती रही... बिना पलक झपकाए निहार
ती रही ... और बहता रहा मेरी दायीं आँख से आँसू.... न जाने क्यों ? किसलिए बेचैन रहा मेरा मन ,,,,,,,गुजार दी सारी रात यूं ही .....तेजी से धड़कता दिल और तेज धड़कता रहा मानों सीने से निकल कर बाहर आ जाएगा ....मुझे सच में नहीं पता ऐसा क्यों हो रहा है ? पर हो रहा रहा है मेरे प्रिय आ जाओ और प्रेम के दो शब्द भर ही कह दो मेरे मन को शायद कुछ सांत्वना मिल जाये .......देखो दोपहर हो गयी है सूरज सर से गुजर कर ढलने लगा है .....फिर शाम हो जाएगी और गहरा जाएगी रात ...सुनो प्रिय .....
अरे यह क्या तुम हो ? तुम मुझसे बात कर रहे हो ? मेरे मन को खुशियों से भरने को उदास हो रहे हो ? तुम्हें उदास नहीं होना है ! मैं तो तुम्हारे होठों पर वही प्यारी मुस्कान देखना चाहती हूँ ....तुम बहुत प्यारे लगते हो मुस्कराते हुए ....मैंने कहा था न कि प्रेम सदा भारी होता है ! इसमें सच झूठ, अपना पराया, तेरा मेरा कुछ नहीं होता ......अगर सिर्फ मैं ही प्रेम करूंगी तो बस वो भी बहुत है क्योंकि मेरा प्रेम परिधियों से बाहर है ...असीम है अनंत है ....ये प्रेम है सिर्फ प्रेम और कुछ भी नहीं लो अब मैं मुस्कराती हूँ ...तुम भी मुस्करा देना ...उसी प्यारी हंसी को अपने चेहरे से जाने मत देना ......
सीमा असीम
क्रमशः

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