गतांक से आगे

रिया तू मुस्करा

यह सांस कैसे आ रही है? यह धड़कन कैसे धड़क रही है? कभी कभी यूं ही तो महसूस होता है, न जाने क्यों होता है ? पर होता है ! बेजान सा जिस्म जब कोई भी हरकत करने से मना कर देता है, तब ये टूटी फूटी उखड़ी उखड़ी सांसें हमें ऐसा ही अहसास करती हैं ! न जाने वो कौन सा गुनाह, ना जाने वो कौन सा अपराध हुआ है जिसकी यह सजा है कि जीवित होते हुए भी जीवित होने का अहसास नहीं होता ! ऐसे किसी भी पल में मैं तुमसे गले लगने को आतुर हो उठती हूँ ......अपनी आंसुओं से भरी आँखों के साथ अपने दोनों हाथ हवा में उठा कर, मेरे मुंह से सिर्फ दो ही शब्द निकलते हैं ,,,आखिर मेरी क्या गलती थी प्रिय ? 
लेकिन फिर अपने लब सी लेती हूँ क्योंकि मैं तुम्हें कोई भी तकलीफ कैसे दे सकती हूँ जब मैनें तुम्हें सिर्फ खुशी देने का अनकहा प्रण ले रखा है ! हर हाल में हर तरह से वो सारी खुशियाँ जो तुमको चाहिए ! 
क्या हुआ अगर मैं जीते जी मर भी रही हूँ सिर्फ इसलिए क्योंकि हम सच हैं न और हमारा प्रेम एकदम निश्चल ! जिसमें न खोने का गम न पाने की लालसा सिर्फ प्रिय की खुशी!
इसके साथ ही यह विश्वास भी कि तुम हर तकलीफ से हर परेशानी से निकल आओगे !
  दिल देता है रो रो दुहाई
  किसी से कोई प्यार न करे  !!!


सीमा असीम ....क्रमशः
    

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