रिया तू मुस्करा
वो अहसास हरदम साँसों में घुले रहते हैं जो तुम पल भर को मुझे दे देते हो ....लेकिन जब जरा सा भी दूरी का एहसास होता है तो मैं घबरा जाती हूँ, मेरा दिल तेजी से धडक उठता है और गले में कुछ अटका अटका सा रहता है .... ऐसा लग रहा है जैसे जिस्म से जान निकली जा रही है ....नींद न जाने कहाँ गायब हो जाती है... पलक झपकती ही नहीं ...जिन रस्तों से हम गुजरे उन रस्तों पर देखो जाकर सिर्फ फूल ही फूल हैं ...मैंने तो तुम्हारी राह में हमेशा फूल ही बिछाए फिर यह कांटे मेरे दमन में कैसे भर दिये ,,,,,बहुत चुभते हैं ...मुझे इस चुभन से बचा लो ,,,प्लीज मुझे जीना है ,,,मैं जीना चाहती हूँ ,,,हँसना ...खिलखिलाना चाहती हूँ ...यह कैसी अगन है ? यह कैसी तपन है ?.मेरे प्रिय मुझे निकालो इस उलझन से ....मेरा दम घुट रहा है ....मानों साँसे थम रही हैं .....खोजती रही हूँ तुम्हें ही पूरा दिन......आज मेरे मन का पंछी बहुत ज्यादा बेचैन है................मत दो मुझे इतनी सजा............
न जाने क्यों तुमने मुझे यह सज़ा दी ....पता नहीं कौन सी वो गलती की जो मैं अकेले ही इस सज़ा को भुगत रही हूँ .......तुम सच बताना क्या मैंने कभी भी तुम्हारे साथ कोई छल या धोखा किया ? अपने दिल पर हाथ रखो फिर बताओ ? मैंने तो सिर्फ विश्वास किया और तुम्हें देव मान कर पूजा,,, सच्ची इबादत की है तुम्हारी फिर ऐसी क्या बजह थी जो तुमने मेरे साथ छल किया ? मेरे विश्वास को तोड़ दिया लेकिन मैं तो तब भी तुम पर भरोसा करती रही ? क्या तुम्हारे लिए जिस्मानी सुख इतना मायने रखता है और तुम इसके लिए कुछ भी कर सकते हो ? देखना एक दिन मैं तुम्हें कहीं भी नहीं मिलूँगी ..... कभी नहीं मिलूँगी....
जब मैं बेतरह से घबरा जाती हूँ तब सोचती हूँ किससे करूँ तुम्हारी शिकायत ? क्या तुम्हें एक पल को भी ख्याल नहीं आता ? जिस तरह का तुम्हारा तरीका है क्या यह सही है ? मैं नहीं जानती कि तुम क्या सोचते हो लेकिन सच तो यह है कि तुम गलत सोचते हो सब गलत ! किसी की सच्चाई का मासूमियत का यूं फायदा मत उठाओ ...प्लीस मत दिल दुखाओ ,,,मत रुलाओ .....
क्रमशः
सीमा असीम

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