रिया तू मुस्करा
रहिमन निज मन की व्यथा मन में रखो गोय
सुनि इठलैहैं लोग सब बाटि न लैहै कोय॥
क्या इतना ही काफी नहीं है प्रिय कि मैं तुम्हें हर पल में सोचती हूँ हर पल मे नाम लेती हूँ ....इसके सिवाय न कोई और काम याद रहता है, न ही किसी में मन लगता है ॥बस एक इसी काम में इतना व्यस्त रहती हूँ कि पल भर का समय ही नहीं मिलता ...न जाने कहाँ गुजर जाते हैं ...कब गुजर जाते हैं दिन और रात कोई होश ही नहीं न खाने का, न पीने का, न सोने का ...लेकिन प्रिय क्या यह सब बातें मेरी, तुम्हें समझ आती हैं ...शायद आती ही होगी .. .
हल्का सा नशा सा और हल्की हल्की सी खुमारी सी रहती है फिर भी न नींद आती है न ही सकुन मिलता है ....अजीब सी कशमकश !! जैसे बिना पानी के मछली तड़पती है वैसे ही मेरा मन मचल उठता है ॥समुंदर की तपती रेत पर नंगे पाँव दौड़ जाने का, दुनियाँ में कहीं ऐसी जगह चले जाने का, जहां पर मेरी तन्हाई को कोई भी तोड़ ही न सके.......बैठी रहूँगी तुम्हें अपने ख़यालों में साथ लिए हुए....वहाँ तो कोई बंदिश नहीं होगी न ....न समाज की, न ही दुनियाँ की.....सब कुछ तो छोड़ दिया है मैंने अब बस यह दुनियाँ और छोडनी है.... बहुत पक्की हूँ अपने विश्वास पर......यह भी आजमा लेना तुम ... जब कभी जी चाहें तब !!
प्रिय तुम्हारी उस तस्वीर को बार बार चूमकर अपने माथे से लगा लेती हूँ जो मेरे मन में...मेरे दिल में रहती है और आँखों में बसी है ,,,,,मेरा रोम रोम तुम्हारा ही तो नाम पुकारता है !! प्रिय सुनो, यह कोई ख्याल नहीं है ... न ही ख्वाब है बल्कि यही सच है जिसे दुनियाँ में मेरे जीते जी कोई नहीं मिटा सकता ....मुझे लगता है जब मैं मर जाऊँगी तब भी यही नाम मेरे लबों पर होगा .....
सीमा
क्रमशः
रहिमन निज मन की व्यथा मन में रखो गोय
सुनि इठलैहैं लोग सब बाटि न लैहै कोय॥
क्या इतना ही काफी नहीं है प्रिय कि मैं तुम्हें हर पल में सोचती हूँ हर पल मे नाम लेती हूँ ....इसके सिवाय न कोई और काम याद रहता है, न ही किसी में मन लगता है ॥बस एक इसी काम में इतना व्यस्त रहती हूँ कि पल भर का समय ही नहीं मिलता ...न जाने कहाँ गुजर जाते हैं ...कब गुजर जाते हैं दिन और रात कोई होश ही नहीं न खाने का, न पीने का, न सोने का ...लेकिन प्रिय क्या यह सब बातें मेरी, तुम्हें समझ आती हैं ...शायद आती ही होगी .. .
हल्का सा नशा सा और हल्की हल्की सी खुमारी सी रहती है फिर भी न नींद आती है न ही सकुन मिलता है ....अजीब सी कशमकश !! जैसे बिना पानी के मछली तड़पती है वैसे ही मेरा मन मचल उठता है ॥समुंदर की तपती रेत पर नंगे पाँव दौड़ जाने का, दुनियाँ में कहीं ऐसी जगह चले जाने का, जहां पर मेरी तन्हाई को कोई भी तोड़ ही न सके.......बैठी रहूँगी तुम्हें अपने ख़यालों में साथ लिए हुए....वहाँ तो कोई बंदिश नहीं होगी न ....न समाज की, न ही दुनियाँ की.....सब कुछ तो छोड़ दिया है मैंने अब बस यह दुनियाँ और छोडनी है.... बहुत पक्की हूँ अपने विश्वास पर......यह भी आजमा लेना तुम ... जब कभी जी चाहें तब !!
प्रिय तुम्हारी उस तस्वीर को बार बार चूमकर अपने माथे से लगा लेती हूँ जो मेरे मन में...मेरे दिल में रहती है और आँखों में बसी है ,,,,,मेरा रोम रोम तुम्हारा ही तो नाम पुकारता है !! प्रिय सुनो, यह कोई ख्याल नहीं है ... न ही ख्वाब है बल्कि यही सच है जिसे दुनियाँ में मेरे जीते जी कोई नहीं मिटा सकता ....मुझे लगता है जब मैं मर जाऊँगी तब भी यही नाम मेरे लबों पर होगा .....
सीमा
क्रमशः


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