गतांक से आगे 
रिया तू मुस्करा


ऐसा होता है तो क्यों होता है ? पर ऐसा ही होता है .....सुबह से कितनी ही बार फोन उठाया था फिर रख दिया था, बस दो बातें करनी थी, कर लूँ, कह दूँ ...सुन लूँ शायद समझ जाये मन,, सुलझ जाये उलझन, भर जाए मन में ऊर्जा ...हो जाये प्रफुल्लित तन मन लेकिन कर ही नहीं पायी कोई बात, ना जाने कैसी शिकायत है जो आकर बैठ गयी है दिल पर ....जिसने सी दिये हैं लब !,,,इसके बाद भी एक उम्मीद जब भी बजती सुरीली धुन बिखेरती हुई फोन की घंटी ...कहीं तुम्हारा तो नहीं ....कितनी ही बार बजा था फोन और हर बार यही तमन्ना ....
अचानक से फिर बजा फोन कहीं तुम्हारा तो नहीं .....अचंभित .....हाँ ये तो तुम ही हो ........बुझते हुए चरागों में मानों तेल बढ़ा दिया हो ......मुस्करा दिये थे खामोश लब और नूर सा बरस पड़ा ......भावनाओं का ....जज़्बातों का ...पूरा संसार ही ....इद्र्धनुषी रंग भर कर बिखर गया मेरे आसपास ....
 सुनो प्रिय, मैं प्रेम करती हूँ तुमसे .....हाँ मैं प्रेम में हूँ तुम्हारे ....विशाल सागर सा हरहराता प्रेम, मेरे मन में ठाठें मारता हुआ रचने लगा है अनोखा आकाश ....
होता है हाँ हमेशा ही ऐसा होता आया है और होता रहेगा ....क्योंकि यह प्रकृति साथ निभाती है सदा ...उस प्रेम  का, जो सच है ......दुनियाँ की सारी शक्तियाँ आ जाती हैं ....और फिर गढ़ती है एक अन्य इतिहास .....कर लो लाख पर्दे .....लेकिन
प्रकृति जब स्वछ्न्द हो तो प्रेम कैसे दब के ...दम तोड़ देगा .......
दिल में घुट जाएगा .....सुनो प्रिय लबों के कुछ कहने से पहले ही
प्रकृति संदेश पहुँचा आएगी तुम तक........कहाँ जरूरत रहती है तब तुमसे कुछ भी कहने या सुनने की जब साथ है हमारे सदा
ये प्रकृति....

सीमा असीम 
क्रमशः

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