रिया तू मुस्करा

सागर की बाहों में मौजें हैं जितनी !
 हमको भी तुमसे मोहब्बत है उतनी !!
 हर पल एक लहर सी उठती है मन में और टकराती है आकर मेरे ख़यालों से फिर पलट कर चली जाती है और फिर यह सिलसिला यूं ही चलता ही रहता है बिना किसी भी बात की परवाह किए ! ऐसा क्यों होता है ? हर पल तुमसे बात करने की चाहत क्यों पैदा हो गयी है मन में ! क्यों हूक सी उठती है प्रिय मेरे मन में ? क्यों अनेकों सवाल, जवाब करता रहता है मन ? क्यों हर घड़ी तस्ब्बुर में तुम रहते हो ? क्यों कोई आरज़ू है मन में ? क्यों यह बेकरारी सी बनी रहती है ? 
प्रिय जब तुम मेरे साथ हो .....तो यह कैसी आरज़ू ? मुझे बस इतना पता है कि यह चाहत कभी न तो कम होगी न ही कभी अब उदास होगी ....क्योंकि मुझे मालूम है मेरा प्यार सिर्फ आपके लिए है ... मैं सिर्फ आपकी ही हूँ प्रिय ! सुनो प्रिय मैं तुम्हें बंधन में नहीं बांधना चाहती पर मैं खुद को पल भर को भी तुमसे विलग नहीं होने देना चाहती.....बस इतना समझ लो कि जब तक यह प्रेम है तब तक ही मेरा जीवन है........क्रमशः 
सीमा असीम

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