वो एक वेश्या है
वो भी तो एक औरत है
वेश्या होने से पहले
किसने बनाया उसे वेश्या
तुम पुरुषों ने ही तो
वो नुचवा लेती है अपना जिस्म
उतार देती है तुम्हारे सामने अपने कपड़े
हो जाती है नग्न
और शर्म को त्याग
तुम पुरुष झूठी शान दिखाने वाले
टूट पड़ते हो उस पर किसी भूखे शेर की मानिंद
डरी सहमी हिरनी सी उस वेश्या पर
वो चंद कागज के टुकडो की खातिर अपनी देह बेंच देती है
अपने पेट की भूख मिटाने को
बन जाती हवस का निवाला
मुस्कुरा कर लूटते हो खूब
बोलते हो मीठे शब्द
करते हो प्यार का नाटक
अपने स्वार्थ की खातिर
उससे दूर होते ही देने लगते हो उसे गाली
वेश्या कह कर उठाते हो उसके चरित्र पर उँगलियाँ
हे पुरुषों जो तुम्हें तृप्त करती है
वासना की भूख शांत करती है
उसे कहते हो यह तो औरत के नाम पर कलंक है
शर्म आती है इसे औरत कहते हुए
हे पुरुष
नामी इंसान क्या यही है तुम्हारी सच्चाई
किसी भी औरत
की इज्ज़त करने का ढोंग
वो ना जाने
किन किन परिस्थितियों से गुजर कर
यहाँ तक आई
है कभी सोचा है
क्या पता
क्या मजबूरियां रही होंगी
हे शराब सिगरेट
अय्याशी के शौकीन पुरुषों
वो तो एक
वेश्या है पेट भरने को अपना और अपने परिवार का
वो बेंचती
है अपना जिस्म
पर वो अपना
जमीर नहीं बेचती
वो अपना मन
नहीं बेचती
उसका भी ईमान
होता है
सच होता है
दिन के उजालों
में सफ़ेद कपड़ों में लिपटे
हे इज्ज़तदार
पुरुषों कभी अपने गिरेवान मे झांक कर देखो
पहचानों जरा
अपनी हकीकत
वो तो एक
वेश्या पर तुम कौन हो ??
सीमा असीम

Comments
Post a Comment