गतांक
से आगे
 रिया  तू मुस्करा

जब न कुछ लिखने का मन करता है, न कुछ पढ़ने का, न कहने का, न ही कुछ सुनने का ॥तब मैं बातें करती हूँ इन हवाओ से, फिज़ाओं से, किसी दरख्त के नीचे खड़े होकर उसके लहलहाते हुए एक एक पत्ते से ......सूर्य के उगने से पहले ही लगा देती हूँ सारे पौधों को पानी ,न जाने क्या गुन गुन बोलते हुए ....हवाएँ सुन लेती हैं वो गाना जो मैंने मन ही मन बुदबुदाते हुए कहा था .....ओ दिव्य पुरुष तुमने खुद को कैसे समझ लिया इतना मामूली .....क्या तुम नहीं जानते, नहीं समझते तुम प्रेम हो मेरा ...वो क्षितिज जहां का कण कण प्रतीक है मेरे प्रेम अश्रुयों का , जो बिना किसी बाधा के चूमते रहते हैं मेरे अंगों को ...कैसे बांध दोगे प्रिय मेरे प्रेम को तुम बंधनों में....मैं खुलकर इजहार करना चाहती हूँ ... वो गीत गुनगुनाना चाहती हूँ जो मैंने लिखे हैं प्रेम में डूबकर, वो नाम ज़ोर ज़ोर से पुकारना चाहती हूँ जो मैं मन में किसी मनका की तरह पल पल लेती हूँ ...प्रिय सुनो, मैं तुम्हें सिर्फ तुम्हें ही तो प्यार करना चाहती हूँ .....क्या मार दोगे मेरा प्रेम ...पिलाकर जहर या घोट दोगे गला दबाकर इन बंदिशों में .....मेरे प्रेम का संदेश जब झूम झूम कर हवाए गा रही है तो इन हवाओं को कैसे रोक दोगे प्रिय .....बताओ कैसे रोक दोगे ...

सीमा असीम 
क्रमशः

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